बुधवार, 24 अगस्त 2016

रुद्राक्ष धारण के नियम -

रुद्राक्ष धारण के नियम -
1
सभी वर्ण के लोग रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।
यदि किसी कारण वश रुद्राक्ष विशेष मंत्रो से धारण न कर सके तो सरल विधि से लाल , पीले या सफ़ेद धागे मे पिरो कर गंगा जल से स्नान करा कर “ॐ नमः शिवाय" का जप कर के,
चन्दन, विल्व पत्र ,लाल पुष्प ,धूप दीप दिखा कर ' शिव गायत्री मंत्र ' द्वारा अभिमंत्रित कर धारण करें और यथाशक्ति शिव मंदिर मे दान दें।
धारण करते समय " ॐ नम:शिवाय " का जप करें , ललाट पर भस्म लगाएँ।
अपवित्रता के साथ धारण न करें,
भक्ति और शुद्धता से ही धारण करें, अटूट श्रद्धा और विश्वास से धारण करने पर ही शुभ फल प्राप्त होता है.
2
कभी भी काले धागे मे धारण न करें।
वैसे शनि के प्रभाव के कारण विशेष रुद्राक्ष काले धागे मे पहनने का विधान भी है।
किन्तु लाल, पीले या सफेद धागे मे पिरोकर ही धारण करें,
चाँदी, सोना या तांबे मे भी धारण कर सकते हैं।
3
रुद्राक्ष हमेशा विषम संख्या मे धारण करें।
अर्थात किसी भी मुखी रुद्राक्ष के साथ 2 पंचमुखी रुद्राक्ष भी सम्मिलित करें , इस प्रकार वे 3 हो जाएँगे।
4
रुद्राक्ष धारण करने पर मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहजन,लिसोडा आदि पदार्थो का यथासंभव परित्याग कर देना चाहिए।
इन निषिद्ध वस्तुओं के सेवन का 'रुद्राक्ष-जाबा लोपनिषद्' मे सर्वथा निषेध किया गया है।
5
रुद्राक्ष को गंगाजल से धोकर शिवलिंग अथवा शिवमूर्ति से स्पर्श धारण करें।
स्वयं की शुभता की प्रार्थना करें व कुछ दक्षिणा प्रदान कर धारण करें।
6
रुद्राक्ष हमेशा नाभि के ऊपर शरीर के विभिन्न अंगों ( कंठ, गले, मस्तक, बांह, भुजा) मे धारण करें,
यद्यपि शास्त्रों मे विशेष परिस्थिति मे विशेष सिद्धि हेतु कमर मे भी रुद्राक्ष धारण करने का विधान है।
तांत्रिक प्रयोग के कारण ,अत्यधिक मासिक स्त्राव से त्रस्त एक महिला को मैंने कमर मे रुद्राक्ष पहनवाया था , जो कि शास्त्र अनुसार अनुचित था।
किन्तु 2 दिन मे ही बीमारी से छुटकारा मिल गया था।
7
रुद्राक्ष अंगूठी मे कदापि धारण नहीं करें,
अन्यथा भोजन-शौचादि क्रिया मे इसकी पवित्रता खंडित हो जाएगी।
8
रुद्राक्ष पहन कर श्मशान या किसी अंत्येष्टि कर्म मे अथवा प्रसूतिगृह मे न जायेँ।
संभोग के समय भी रुद्राक्ष उतार देना चाहिए।
9
स्त्रियां मासिक धर्म के समय रुद्राक्ष धारण न करें।
10
रुद्राक्ष धारण कर रात्रि शयन न करें।
11
रुद्राक्ष मे अंतर्गर्भित विद्युत तरंगें होती हैं जो शरीर मे विशेष सकारात्मक और प्राणवान ऊर्जा का संचार करने मे सक्षम होती हैं,
इसी कारण रुद्राक्ष को प्रकृति की " दिव्य औषधि " कहा गया है।
अतः रुद्राक्ष का वांछित लाभ लेने हेतु समय-समय पर इसकी साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
शुष्क होने पर इसे सरसों या नीम के तेल मे कुछ समय तक डुबाकर रखें।
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रुद्राक्ष धारण करने का शुभ महूर्त -
धारण के एक दिन पूर्व संबंधित रुद्राक्ष को किसी सुगंधित अथवा सरसों के तेल मे डुबाकर रखें।
धारण करने के दिन उसे कुछ समय के लिए गाय के कच्चे दूध में रख कर पवित्र कर लें।
फिर प्रातः काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर ॐ नमः शिवाय मंत्र का मन ही मन जप करते हुए रुद्राक्ष को पूजास्थल पर सामने रखें।
फिर उसे पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, मधु एवं शक्कर) अथवा
पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर) से अभिषिक्त कर गंगाजल से पवित्र करके अष्टगंध एवं केसर मिश्रित चंदन का लेप लगाकर धूप, दीप और पुष्प अर्पित कर विभिन्न शिव मंत्रों का जप करते हुए उसका संस्कार करें।
तत्पश्चात संबद्ध रुद्राक्ष के शिव पुराण अथवा पद्म पुराण वर्णित या शास्त्रोक्त बीज मंत्र का 21, 11, 5 अथवा कम से कम 1 माला जप करें।
फिर शिव पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय अथवा शिव गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् का 1 माला जप करके रुद्राक्ष-धारण करें।
अंत में क्षमा प्रार्थना करें।
रुद्राक्ष धारण के दिन उपवास करें अथवा सात्विक अल्पाहार लें।
उक्त क्रिया संभव नहीं हो, तो शुभ मुहूर्त या दिन में (विशेषकर सोमवार को) संबंधित रुद्राक्ष को कच्चे दूध, पंचगव्य, पंचामृत अथवा गंगाजल से पवित्र करके, अष्टगंध, केसर, चंदन, धूप, दीप, पुष्प आदि से उसकी पूजा कर शिव पंचाक्षरी अथवा शिव गायत्री मंत्र का जप करके पूर्ण श्रद्धा भाव से धारण करें।
मेष संक्रांति ,
पूर्णिमा,
अक्षयतृतीया,
दीपावली,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,
अयन परिवर्तन काल,
ग्रहण काल,
गुरु पुष्य ,
रवि पुष्य,
द्वि और त्रिपुष्कर योग अथवा सोमवार के दिन रुद्राक्ष धारण करने से समस्त पापो का नाश होता है।
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रुद्राक्ष धारण के ज्योतिषीय मत -
एकमुखी सूर्य का प्रतीक - सूर्य दोष शमनकारी।
द्विमुखी चंद्र का प्रतीक - चंद्र दोष दूर करता है।
त्रयमुखी मंगल का प्रतीक - मंगल दोष दूर करता है।
चतुर्मुखी बुध का प्रतीक - बुध दोष दूर करता है।
पंचमुखी गुरु का प्रतीक - गुरु दोष दूर करता है।
षष्ठमुखी शुक्र का प्रतीक - शुक्र दोष दूर करता है।
सप्तममुखी शनि का प्रतीक - शनि दोष दूर करताहै।
अष्टमुखी राहु का प्रतीक - राहु दोष दूर करता है।
नवममुखी केतु का प्रतीक - केतु दोष दूर करता है।
दशममुखी राहु-केतु, शनि-मंगल के दोष को दूर करता है।
एकादशमुखी समस्त ग्रहों,राशि, तांत्रिक दोषों को दूर करता है।
द्वादशमुखी समस्त ग्रह दोष दूरकर व्यक्ति मे सूर्य का बल बढ़ाता है।
त्रयोदशमुखी पुरुष जनित दुर्बलता दूर कर शारीरिक-आर्थिक क्षमता प्रदान करता है।
रुद्राक्ष वस्तुत: महारुद्र का अंश होने से परम पवित्र एवं पापों का नाशक है,
इसके दिव्य प्रभाव से जीव शिवत्व प्राप्त करता है।
भारतीय संस्कृति मे रुद्राक्ष का बहुत महत्व है।
माना जाता है कि रुद्राक्ष मनुष्य को हर प्रकार की हानिकारक ऊर्जा से बचाता है। इसका उपयोग केवल साधक और तपस्वियों के लिए ही नहीं,
बल्कि सांसारिक जीवन मे रह रहे लोगों के लिए भी किया जाता है।

रविवार, 21 अगस्त 2016

हमें तिलक क्यों लगाना चाहिए ?

हमें तिलक क्यों लगाना चाहिए ? या जब तिलक कोई और लगा रहा हो, उस समय सिर पर हाथ क्यों रखना चाहिए ?


~आइये जाने इसका वैज्ञानिक महत्व~
शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगा
कर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।
स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलक का महत्व
हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।
मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।
तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।
तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।
तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।
– हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कोई भी पूजा-प्रार्थना तिलक बिना लगाये नहीं होती। सूने मस्तक को अशुभ माना जाता है। तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना भी हमारी एक परंपरा है।
– धर्म शास्त्रों के अनुसार सुने मस्तक को अशुभ और असुरक्षित माना जाता है। तिलक लगाने के लिए अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है।
– मध्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है।
– अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है।
– तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है।
– ज्योतिष के अनुसार अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है। यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्वी, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे।
– दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है। जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है।
– जब अंगुली या अंगूठे से तिलक किया जाता है तो आज्ञा चक्र के साथ ही सहस्रार चक्र पर ऊर्जा का प्रवाह होता है। सकारात्मक ऊर्जा हमारे शीर्ष चक्र पर एकत्र हो साथ ही हमारे विचार सकारात्मक हो व कार्यसिद्ध हो। इसीलिए तिलक लगावाते समय सिर पर हाथ जरूर रखना चाहिए.

शनिवार, 20 अगस्त 2016

हवन द्वारा मनोकामना पूर्ती

हवन द्वारा मनोकामना पूर्ती 
1. लक्ष्मी के बीज मन्त्र ‘श्रीं’ के साथ प्रारंभ में प्रणव ‘ॐ’ और ;ह्रीं’ लगाकर ‘क्लीं’ और इसके बाद ‘फट स्वाहा’ यानी ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं फट स्वाहा’ मन्त्र से घी मिश्रित कमल या खीर से एक हजार हवन करता है; वह अतुल धन की प्राप्ति करता है। (आम की समिधा)
2. इसी मन्त्र के द्वारा गूलर की समिधा में जो पद्म बीजों से एक हजार हवन करता है; उसको कभी किसी से भय नहीं सताता और वह शत्रु पर विजय प्राप्त करता है।
3. दही मिश्रित चावल , तिल, जौ, गेंहू, ईंख से आम की समिधा में जो एक हजार हवन करता है; उसे भाग्य की दुर्गति से मुक्ति मिलती हैं।
4. दुर्जा जी के मन्त्रों से बेल के फल का हवन से (बेल की ही समिधा) धन की रक्षा होती है और धन की प्राप्ति होती है।
5. सरस्वती या तारा के मन्त्रों से चमेली के फूलों को इसी के तेल से मिश्रित करके हवन करने से अक्षय वाक्शक्ति प्राप्त होती है।
6. ब्राह्मी के रस से (4:1) पकाए घी को सरस्वती या तारा के मन्त्र से सिक्त करके प्रातः सायं पचने योग्य घी का पान करने से समरण शक्ति एवं वाक्शक्ति समृद्ध होती है।
7. प्रातःकाल बच के एक तोला (12 ग्राम) चूर्ण को सरवती – तारा के मंत्र से सिक्त करके खाकर ऊपर से दूध पीने वाले की स्मरण शक्ति अदभुत रूप से विकसित होती है।
8. अपामार्ग की समिधा में दुर्गा मन्त्रों से दूब एवं घी का हवन करने से स्वास्थय एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है। वहाँ बाहरी प्रकोप नहीं होते।
9. पलाश को घी से सिक्त करले आम की लकड़ी में गायत्री मन्त्र से हवन करता है; वह जीवन में सभी भौतिक सुखों को प्राप्त करता है।
10. कमर भर जल में ब्रह्म मुहूर्त में जो प्रतिदिन 108 गायत्री मंत्र का जप पूर्व दिशा की ओर मुख करके करता है; उसके पाप कटते हैं; दुःख दूर होता है

सुखी जीवन के सरल उपाय

सुखी जीवन के सरल उपाय
1-प्रतिदिन अगर तवे पर रोटी सेंकने से पहले दूध के छींटे
मारें, तो घर में बीमारी का प्रकोप कम होगा।
2-प्रत्येक गुरुवार को तुलसी के पौधें को थोडा - सा दूध
चढाने से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
3-प्रतिदिन संवेरे पानी में थोडा - सा नमक मिलाकर घर में
पोंछा करें, मानसिक शांति मिलेगी।
4-प्रतिदिन सवेरे थोडा - सा दूध और पानी मिलाकर मुखय
द्वार के दोनों ओर डाले, सुख - शांति मिलेगी।
5-मुखय द्वार के परदे के नीचे कुछ घुंघरु बांध दे, इसके संगीत
से घर में प्रसन्नता का वातावरण बनेगा।
6-प्रतिदिन शाम को पीपल के पेड को थोडा - सा दूध -
पानी मिलाकर चढाएं, दीपक जलाएं तथा मनोकामना के साथ
पांच परिक्रमा करें। शीघ्र मनोकामना पूरी होगी।
7-प्रतिदिन सवेरे पहली रोटी गाय को, दूसरी रोटी कुत्ते
को एवं तीसरी रोटी छत पर पक्षियों को डालें।
इससे पितृदोष से मुक्ति मिलती है तथा पितृदोष के कारण
प्राप्त कष्ट समाप्त होते हैं
8-किसी भी दिन शुभ - चौघडिये में पांच किलो साबूत नमक
एक थैली में लाकर अपने घर में ऐसी जगह रखें
जहां पानी नहीं लगे। यदि अपने आप पानी लग जाए तो इसे
काम में नहीं ले, फेंक दे तथा नया नमक लाकर रख दें। यह घर
के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है एवं सकारात्मक
प्रभाव को बढा

सोमवार, 25 जुलाई 2016

मंगल का स्वरूप



मंगल का स्वरूप
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मित्रों ज्योतिष में मंगल को हमारे शरीर में खून और मज्जा का कारक माना गया है ये एक ऐसा ग्रह है जो जब हमारे पास कुछ भी न हो तब भी हमे मनोबल देता है | हमारे साहस का ये कारक माना गया है | ये जोश का कारक ग्रह है इसिलिय इसे लड़ाई झगड़े का कारक ग्रह माना गया है क्योंकि जब तक ये जोश पैदा न करे लड़ाई झगड़ा नही हो सकता \ कुंडली में अच्छी सिथ्ती का मंगल हमे सेना पुलिस डॉक्टर छेत्र इन्जिनियेर छेत्र में जाने के सुनहरे अवसर प्रदान करता है तो वंही अशुभ मंगल होने पर जातक लुट मार पिट करने लग जता है और अपने साहस बल का प्रयोग गल तरीके से करने लग जाता है | इसका कारण ये भी है जब मंगल अशुभ हो तो जातक राहू हावी होने लग जता है उसका कारण ये भी है की लाल किताबा में मंगल को राहू पर काबी पाने वाला ग्रह माना गया है और ऐसे में जब मंगल खुद ही खराब हो जाए तो जातक राहू रूपी शराब का सेवन करने लग जाता है , जातक पर स्त्री के चक्कर में भी पड़ जाता है ऐसे में पुरुष जातक को उसकी पत्नी तो स्त्री जातक को उसका पति भी तंग करना सुरु कर देता है |
मंगल जब भी बुद्ध के साथ हो या फिर कुंडली में सूर्य शनी एकसाथ हो तो या नीच राशि में हो तो मंगल खराब बन जाता है ऐसे में यदि जातक को कोई उंचा पद मिल जाए तो वो उस पद का भी दुरूपयोग करने लग जाता है और राहू की चालाकी जूठ फरेब दोखा आदि जातक की सिफत बन जाती है | खराब मंगल वाला जातक अक्सर हथियार के बल पर लोगों का लुटने का कार्य भी करने लग जाता है|
हमारे दैनिक जीवन में मंगल का शुभ होना बहुत आवश्यक है क्योंकि किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य मंगल के बिना सफल नही हो सकते | जिन लोगो की कुंडली में मंगल खराब होता है उनके घर में अक्सर किसी मांगलिक कार्य के बाद कोई अनहोनी या खुसी को दुःख में बदलने वाली घटना घट जाती है | जैसे की आपकी नोकरी लगी आपको बहुत ख़ुशी हुई लेकिन कुछ समय बाद खबर मिलती है की पोस्टिंग छेत्र ऐसा है जिसमे कोई जाना भी पसंद नही करता तो आपकी ख़ुशी काफूर हो जाती है | इसी प्रकार आपको कोई धन लाभ मिलता है लेकिन कोई ऐसी समस्या a खड़ी हो जाती है की आपका पूरा पैसा खर्च हो जाता है \ घर में कोई शादी या मांगलिक कार्य होता है लेकिन उसी समय के दौरान किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाती है | दुसरे शब्दों में कहे की आप ख़ुशी का मांगलिक कार्यों का पूर्ण आनन्द नही ले पाते है | पति पत्नी के झगड़े जीवन में नित्य का विषय बन जाते है | तो येमंगल खराब होने के लक्ष्ण होते है \
वर्तमान समय में हम देखें तो मंगल मौत की राशि विर्श्चिक में चल रहे है \ हालाँकि इस राशि के स्वामी खुद मंगल ही राशि है लेकिन कालपुरुष की कुंडली में अस्ठ्म भाव में इस राशि के होने से खुद मंगल के शुभ फल इसमें कम हीओ माने गये है | आप देखें की जब से मंगल इस राशि में आये है जहां मौत के कारण शनी देव पहले से विराजमान थे तब से संसार में आतंकवाद के घटनाए ज्यादा बढ़ गई है जगह जगह युद्ध के हालत बन गये है | यदि आपका जन्म मेष मिथुन तुला लग्न में हुआ है तो ये समय आपके स्वास्थ्य के लिय भी अच्छा नही है , यदि आपकी दशा भी किसी अच्छे ग्रह की नही चल्र ही है तो वर्तमान समय में आपको बहुत सी समस्यों का सामना वर्तमान में करना पड़ रहा है | जिनकी भी कुंडली में मंगल मुख्य कारक ग्रह है उन्हें भी जीवन के विभिन्न छेत्रों में समस्या का सामना करना पड़ रहा है जैसे की कर्क लग्न वालों के कार्य भी वर्तमान समय में बहुत ज्यादा पप्रभाव इस समय के दौरान पड़ा है \ मित्रों आंशिक रूप से मंगल पर कुछ लिखने की कोसिस की है \ हालाँकि हम सभी जानते है की हमे कुंडली के सभी ग्रह प्रभावित करते है इसिलिय हम किसी एक ग्रह के आधार पर अंतिम निष्कर्ष पर नही पहुँच सकते |समय समय पर आगे भी इसके उपर लिखता रहूँगा
यदि आपको मंगल जनित अशुभ फल मिल रहे है तो आप चन्द्र की सहायता से उसके अशुभ फलों में कमी कर सकते है \
जय श्री राम

रविवार, 24 जुलाई 2016

धर्मशास्त्रों में वृक्षों का महत्व



धर्मशास्त्रों में वृक्षों का महत्व
पीपल के पेड़ को धर्मशास्त्रों में सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। इस एक पेड़ को मुक्ति के लाखों, करोड़ों उपायों के समकक्ष निरूपित किया है। गीता में भी श्रीकृष्ण ने पीपल को श्रेष्ठ कहा है। भविष्य पुराण में ऐसे कई पेड़ों का उल्लेख है जो पापनाशक माने गए हैं। वृक्षायुर्वेद में पेड़ों के औषधीय महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी है।
वनस्पति जगत में पीपल ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जिसमें कीड़े नहीं लगते हैं। यह वृक्ष सर्वाधिक ऑक्सीजन छोड़ता है जिसे आज विज्ञान ने स्वीकार किया है। भगवान बुद्ध को जिस वृक्ष के नीचे तपस्या करने के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह पीपल का पेड़ ही है और श्रीमद् भागवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि वृक्षों में श्रेष्ठ पीपल है।
भविष्य पुराण में ही बताया गया है कि शीशम, अर्जुन, जयंती, करवीर, बेल तथा पलाश के वृक्षों को लगाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और रोपणकर्ता के तीन जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
सौ वृक्षों का रोपण करना ब्रह्मारूप और हजार वृक्षों का रोपण करने वाला विष्णुरूप बन जाता है। अशोक वृक्ष के बारे में लिखा है कि इसके लगाने से शोक नहीं होता। अशोक वृक्ष को घर में लगाने से अन्य अशुभ वृक्षों का दोष समाप्त हो जाता है। बिल्व वृक्ष को श्रीवृक्ष भी कहते हैं। यह वृक्ष अति शुभ माना गया है। इसमें साक्षात लक्ष्मी का वास होता है तथा दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है।
इसी प्रकार वटवृक्ष के बारे में भी विस्तार से शास्त्रों में बताया गया है। वृक्षायुर्वेद में बताया गया है कि जो व्यक्ति दो वटवृक्षों का विधिवत रोपण करता है वह मृत्योपरांत शिवलोक को प्राप्त होता है।
भविष्य पुराण में ही बताया गया है कि वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद, सुपारी का वृक्ष सिद्धप्रद, जामुन वृक्ष धनप्रद, बकुल पाप-नाशक, तिनिश बल-बुद्धिप्रद तथा कदम्ब वृक्ष से विपुल लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
आंवले का वृक्ष लगाने से अनेक यज्ञों के सदृश पुण्यफल प्राप्त होता है।
गूलर के पेड़ में गुरुदत्त भगवान का वास माना गया है।
पारिजात के वृक्ष के बारे में तो यह बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण इसे स्वर्ग से लाए थे।
शास्त्रों में बताया गया है कि वृक्षों को काटने वाला गूंगा और अनेक व्याधियों से युक्त होता है। अश्वत्थ (पीपल, वटवृक्ष और श्रीवृक्ष) का छेदन करने वालों को ब्रह्म हत्या का पाप लगता है।
वृक्षों के आरोपण के लिए वैशाख, आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद महीने श्रेष्ठ माने गए हैं। अश्विन, कार्तिक व ज्येष्ठ मास वृक्ष के आरोपण के लिए शुभ नहीं माने गए हैं जबकि पर्यावरण दिवस ज्येष्ठ मास में ही मना रहे हैं। बंजर भूमि को हरियाली में बदलना सचमुच एक भगीरथ प्रयास है।

केतु का महत्व



केतु का महत्व
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मित्रों सांसारिक जीवन में हमे दो तरह के केतु जीवन में मिलते है एक वो जो हमे देते है और दुसरे वो जो हमसे लेते है जैसे मामा भांजा बहनोई और साला | मामा पक्ष से हमे हमेशा ही कुछ न कुछ मिलता रहता है तो भांजे को हमे हमेशा ही कुछ न कुछ देते रहना पड़ता है | साला पक्ष से हमे हमारी पत्नी मिलती है तो हमारे वंस को आगे बढाती है तो साला हमे हमेशा ही कुछ न कुछ देते रहते है जबकि बहनोई को हमे हमेशा देते ही रहना पड़ता है सबसे पहले तो हमे हमारी बहन ही उसे सोंप्नी पडती है वो हमारी बहन को अपने साथ ले जाता है जबकि साले की बहन को हम अपने साथ ले आते है | घरों में कुते और चूहे के रूप में हम केतु को देखते है | कुता जो हमारे घर की रखवाली करता है जबकि चूहा जो हमे हमेशा ही नुक्सान पहुंचता है \ इस प्रकार हमारे दैनिक जीवन में अपनी महता हमे बताता है | केतु हमारे एक अच्छे सलाहकार के रूप में भी सहायता करता है और नुक्सान भी पहुंचा देता है जैसे की यदि आपका केतु शुभ फल दे रहा है तो आप यदि किसी अन्य की सलाह से कार्य करते है तो आपको बहुत लाभ मिलता है जबकि यदि केतु खराब हो तो दूसरों से ली हुई सलाह आपकी बर्बादी का कारण बन जाती है \ केतु एक संकेतक के रूप में भी सहायता कर देता हिया जैसे की हम वाहन चला रहे होते है और सामने से कोई हमे इशारा करके बता देता है की आगे खतरा है तो ये एक सहायक के रूप में सिद्ध होता है | केतु का महत्व आप इस बात से भी समझ सकते है लाल किताब कहती है की जब आपका राहू आपको खराब फल दे रहा हो तो केतु के उपाय से आपको राहत मिलेगी |
केतु के बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है की केट छुडावे खेत यानी की केतु जिस भाव में हो उस भाव से सम्बन्धित जातक में अलगाव पैदा कर देता है | अन्य ग्रहों की तरह केतु की ज्योतिष में अहम भूमिका होती है | केतु गणेश जी , बेटा , भांजा , ब्याज , सलाहकार , दरवेस , दोहता , कुता , सुवर, छिपकली , कान , पैर , पेशाब , रीड की हड्डी , काले सफेद तिल , खटाई ,इमली , केला , कम्बल ,दहेज़ में मिली हुई खाट, लहसुनिया , भिखारी , मामा , दूरदर्शी , चल चलन , खरगोस , कुली , चूहा आदि का कारक केतु माना गया है | चन्द्र मंगल इसके शत्रु ग्रह शुक्र राहू मित्र ग्रह माने गये है बाकी के ग्रह इसके सम होते है | इसका समय रविवार को उषाकाल का होता है इसिलिय इस से सम्बन्धित उपाय यदि इस समय में किये जाए तो विशेष लाभ मिलता
ज्योतिष में केतु को मोक्ष का कारक ग्रह माना गया है | केतु को लाल किताब में कुल को तारने वाला , दुनिया की आवाज़ को मन्दिर तक पहुचाने वाला साधू ,मौत की निशानी यानी मौत आने का समय बताने वाला , गोली की जगह आकर मरने वाला सुवर ,रंग बिरंगा जिसमे लाल रंग न हो ,पुत्र को केतु माना गया है |
केतु को छलावा माना गया है पापी चाहे कैसा भी हो उसे बुरा ही माना गया है | चूँकि केतु की पाप ग्रह में गिनती होती है इसिलिय इसे बुरा ग्रह मना गया है |
केतु सूर्य के साथ होने पर उसके फल को कम कर देता है तो चन्द्र के साथ होने पर चन्द्र को ग्रहण लगा देता है | मंगल या शनी के साथ होने पर बुरा फल नही देता है लेकिन इन दो के साथ यदि कोई तीसरा ग्रह हो तो फिर तीनो का फल ही मंदा हो जाता है | गुरु के साथ उत्तम फल देता है और बुद्ध के साथ होने पर केतु बूरे फल देता है जबकि शुक्र के साथ होने पर केतु शुक्र की सहायता करता है |
चूँकि केतु संतान का कारक है और चन्द्र माता का इसिलिय जब कभी भी केतु चन्द्र के साथ हो या चन्द्र के खाना नम्बर चार में हो तो जातक को संतान से सम्बन्धित समस्या और माता को परेशानी और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है |
केतु के बारे में एक मुख्य कथन है की ना तो चारपाई टूटे न ही बुढिया मरे और न ही बिमारी मालुम हो और न ही सब कुछ सही हो | धीरे धीरे तीर कमान की तरह झुकते जाना मगर टूटना नही यानी की तड़फ ते जाना लेकिन मौत भी न मिलना केतु की ही करामात होती है | जैसा की आपने देखा होगा की कोई उम्र दराज इन्सान चारपाई में काफी समय तक रहता है और दुःख पाता रहता है लेकिन उसे मौत भी नशीब नही होती और ऐसी मौत केवल केतु देता है |
कुंडली में जब केतु बुरा हो तो उसका बुनियादी ग्रह शुक्र को भी आराम नही मिलता | जैसा की आपको पता है की केतु { पुत्र } शुक्र { रज ,वीर्य, पत्नी } का ही नतीजा होता है इसिलिय इसे इसका बुनिआय्दी ग्रह शुक्र कहा गया है | साथ ही जब कभी भी शुक्र को उसके साथी बुध की मदद न मिले या फिर कुंडली में मंगल बद हो तो केतु के उपाय से शुक्र को मदद मिलेगी | शुक्र शनी की गाडी केतु पहिये के बिना आगे नही बढ़ सकती | लाल किताब में केतु को बिर्हस्पती के बराबर का ग्रह माना गया है और केतु को गुरु का चेला कहा गया है ऐसे में जब शुक्र की मदद करने वाला केतु मंदा हो तो उसको ठीक करने के लिय बिर्हस्पती का उपाय करना होगा और फिर केतु शुक्र को मदद देगा | केतु जब भी बुद्ध के साथ या बुद्ध के घर तीन या छटे भाव में होगा बुरा फल देगा |
केतु पीठ का कारक माना गया है इसिलिय उभरी हुई पीठ रईसी की निशानी होगी जबकि छोटी पीठ गुलामी की |
केतु को अला बला यानी भुत प्रेत का कारक भी माना गया है ऐसे में मकान यदि किसी गली में आखरी कोने का हो या मकान केतु का हो यानी जिस मकान में तिन दरवाजे हो या तिन तरफ से खुला हो और केतु कुंडली में खराब हो तो ऐसी बला का उस मकान पर ज्यादा असर होगा| इस मकान के आसपास को कोई मकान गिरा हुआ यानी बर्बाद और खंडर हालत का होगा और कुतों का वहाँ आवागमन होगा या कोई खाली मैदान भी हो सकता है |
पेशाब की बिमारी होना ,, औलाद से सम्बन्धित समस्या होना , पांव के नाख़ून खराब हो जाना , सुनने की ताकत कम हो जाना अदि केतु खराब होने की निशानी होती है |हाथ केअंगूठे के नाख़ून वाला हिसा छोटा हो तो केतु दुश्मनों के साथ या उनके घर में होगा बुरा फल देगा इसी तरह अगर ये हिसा छोटा हो तो भी केतु बुरा फल देगा |
केतु खराब वाले को कान में सुराख करके सोना पहनना हमेशा लाभ देगा | साधू दरवेश की सेवा करना | धारिवाले कुते की सेवा करना | गणेश जी की पूजा करना, अपाहिज की सेवा करना उसकी सहायता करना अदि केतु के मुख्य उपाय है | मित्रों मै पहले भी केतु पर तिन चार पोस्ट कर चूका हूँ आज उन्ही सब पोस्टो को एक ही पोस्ट में सम्मलित करके पोस्ट की है |
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जय श्री राम