रविवार, 30 अक्टूबर 2022

धनदायक श्री कुबेर उपासना विधि

 धनदायक श्री कुबेर उपासना विधि

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कुबेर धन के अधिपति यानि धन के राजा हैं। पृथ्वीलोक की समस्त धन संपदा का एकमात्र उन्हें ही स्वामी बनाया गया है। कुबेर भगवान शिव के परमप्रिय सेवक भी हैं। धन के अधिपति होने के कारण इन्हे मंत्र साधना द्वारा प्रसन्न करने का विधान बताया गया है।
कुबेर साधना रहस्य
〰️〰️〰️〰️〰️〰️👉 एक वार महा ऋषि पुलस्य के सिर पे बहुत बड़ी विपता आ पढ़ी और उन को उस समय में दरिद्रता का सहमना करना पड़ा जिस के चलते उस राज्य की प्रजा काल और सूखे की चपेट में या गई और धन न होने की वजह से चारो तरफ लोग भूख और गरीबी से बेहाल हो उठे तब महा ऋषि पुलस्य ने इस से उबरने के लिए कुबेर की सहायता लेनी चाही क्यू के वोह जानते थे के कुबेर के बिना धन नहीं आ सकता मगर दैवी नियमो के चलते कुबेर सीधे धन नहीं दे सकते थे ! इसलिए महा ऋषि पुलस्य ने गणपती भगवान की साधना की तो गणपती ब्पा ने कुबेर को हुकम दिया के महा ऋषि की सहायता करे तो कुबेर ने कहा के अगर आप कुबेर यंत्र का स्थापन कर मेरे नो रूप में से किसी की भी साधना करेगे तो धन की बरसात होने लगेगी इस लिए महा ऋषि ने गणपती भगवान से प्रार्थना की और गणपती भगवान ने उन्हे कुबेर के 9 दिव्य रूप के मंत्र दिये महा ऋषि ने कुबेर यंत्र स्थापन कर कुबेर के 9 दिव्य रूप की साधना संपन की और परजा को दरिद्रता से उबारा साधना संपन होने से धन की बरसात होने लगी और चारो तरफ खुशहाली फ़ेल गई !इन 9 दिव्य रूपो की साधना आज भी हमारे शास्त्रो में है और जो एक वार इन साधनयों को कर लेता है उस के जीवन में कोई अभाव नहीं रहता
क्या है यह कुबेर के 9 रूप -
1👉 उग्र कुबेर — यह कुबेर धन तो देते ही है साथ में आपके सभी प्रकार के शत्रुओ का भी हनन कर देते है !
2👉पुष्प कुबेर –यह धन प्रेम विवाह ,प्रेम में सफलता ,मनो वर प्राप्ति ,स्न्मोहन प्राप्ति ,और सभी प्रकार के दुख से निवृति के लिए की जाती है !
3👉 चंद्र कुबेर — इन की साधना धन एवं पुत्र प्राप्ति के लिए की जाती है ,योग्य संतान के लिए चंदर कुबेर की साधना करे !
4👉 पीत कुबेर — धन और वाहन सुख संपति आदि की प्राप्ति के लिए पीत कुबेर की साधना की जाती है !इस साधना से मनो वाशित वाहन और संपति की प्राप्ति होती है !
5👉 हंस कुबेर — अज्ञात आने वाले दुख और मुकदमो में विजय प्राप्ति के लिए हंस कुबेर की साधना की जाती है !
6👉 राग कुबेर — भोतिक और अधियात्मक हर प्रकार की विधा संगीत ललित कलाँ और राग नृत्य आदि में न्पुनता और सभी प्रकार की परीक्षा में सफलता के लिए राग कुबेर की साधना फलदायी सिद्ध होती है !
7👉 अमृत कुबेर — हर प्रकार के स्वस्थ लाभ रोग मुक्ति ,धन और जीवन में सभी प्रकार के रोग और दुखो के छुटकारे के लिए अमृत कुबेर की साधना दिव्य और फलदायी है !
8👉 प्राण कुबेर — धन है पर कर्ज से मुक्ति नहीं मिल रही वेयर्थ में धन खर्च हो रहा हो तो प्राण कुबेर हर प्रकार के ऋण से मुक्ति दिलाने में सक्षम है !इन की साधना साधक को सभी प्रकार के ऋण से मुक्ति देती है !
9👉 धन कुबेर — सभी प्रकार की कुबेर साधनयों में सर्व श्रेष्ठ है जीवन में हम जो भी कर्म करे उनके फल की प्राप्ति और धन आदि की प्राप्ति के लिए और मनोकामना की पूर्ति हेतु और भाग्य अगर साथ न दे रहा हो तो धन कुबेर की साधना सर्व श्रेष्ठ कही गई है !
नमस्तुभ्यम् महा मन्त्रम् दायिने शिव रुपिणे, ब्रह्म ज्ञान प्रकाशाय संसार दु:ख तारिणे ।
अती सौम्याय विध्याय वीराया ज्ञान हारिने, नमस्ते कुल नाथाय कुल कौलिन्य दायिने ।।
शिव तत्व प्रकाशाय ब्रह्म तत्व प्रकाशइने, नमस्ते गुरुवे तुभ्यम् साधकाभय दायिने ।
अनाचाराचार भाव बोधाय भाव हेतवे, भावाभाव विनिर्मुक्त मुक्ती दात्रे नमो नम: ।।
नमस्ते सम्भवे तुभ्यम् दिव्य भाव प्रकाशइने, ज्ञानआनन्द स्वरूपाय विभ्वाय नमो नम: ।
शिवाय शक्ति नाथाय सच्चीदानन्द रुपिणे, कामरूप कामाय कामकेलीकलात्मने ।।
कुल पूजोपदेशाय कुलाचारस्वरुपिने, आरक्थ नीजतत्शक्ति वाम भाग विभूतये ।
नमस्तेतु महेशाय नमस्तेतु नमो नम:, यह एदम पठत् स्तोत्रम सधाको गुरु दिङ मुख
प्रातरुथाय देवेशी ततोविध्या प्रशिदति, कुल सम्भव पूजा मादौ योन: पठेएदम ।
विफला तश्य पूजाश्यात विचारआय कल्प्यते, एती श्री कुब्जिका तन्त्रे गुरु स्तोत्रम साम्पूर्णम ।।
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियाएं श्रीविद्यार्णव, मन्त्रमहार्णव, मन्त्रमहोदधि, श्रीतत्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे−बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग−अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। इनके एक मुख्य ध्यान−श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजित दिखाया गया है। इनका वर्ण गारुडमणि या गरुणरत्न के समान दीप्तिमान पीतवर्णयुक्त बताया गया है और समस्त निधियां इनके साथ मूर्तिमान होकर इनके पार्श्वभाग में निर्दिष्ट हैं। ये किरीट−मुकुटादि आभूषणों से विभूषित हैं।
इनके एक हाथ में श्रेष्ठ गदा तथा दूसरे हाथ में धन प्रदान करने की वरमुद्रा सुशोभित है। ये उन्नत उदरयुक्त स्थूल शरीर वाले हैं। ऐसे भगवान शिव के परम सुहृद भगवान कुबेर का ध्यान करना चाहिए−
कुबेर का ध्यान यह मंत्र पढ़कर लगाएं👉
मनुजवाहम्विमानवरस्थितं गरुडरत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं मुकुटादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुन्दिलम्।।
मंत्र महार्णव तथा मंत्र महोदधि आदि में निर्दिष्ट महाराज कुबेर के कुछ मंत्र इस प्रकार हैं−
1. अष्टाक्षरमंत्र👉 ओम वैश्रवणाय स्वाहा।
2. षोडशाक्षरमंत्र👉 ओम श्री ओम ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।
3. पंचत्रिंशदक्षरमंत्र👉 ओम यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
इसी प्रकार वहां बालरक्षाकर मंत्र−यंत्र भी निर्दिष्ट हैं, जिसमें ‘अया ते अग्ने समिधा’ आदि का प्रयोग होता है। यह मंत्र बालकों के दीर्घायुष्य, आरोग्य, नैरुज्यादि के लिए बहुत उपयोगी है। इस प्रकार बालकों के आरोग्य लाभ के लिए भी भगवान कुबेर की उपासना विशेष फलवती होती है। प्रायरू सभी यज्ञ−यागादि, पूजा−उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर की विधिपूर्वक पूजा होती है। यज्ञ−यागादि तथा विशेष पूजा आदि के अंत में षोडशोपचार पूजन के अनन्तर आर्तिक्य और पुष्पांजलि का विधान होता है। पुष्पांजलि में तथा राजा के अभिषेक के अंत में ‘ओम राजाधिराजाय प्रसह्म साहिने’ इस मंत्र का विशेष पाठ होता है, जो महाराज कुबेर की ही प्रार्थना का मंत्र है। महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, धनों के स्वामी हैं, अतः सभी कामना फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर ही समर्थ हैं।
व्रतकल्पद्रुम आदि व्रत ग्रंथों में कुबेर के उपासक के लिए फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी से वर्ष भर प्रतिमास शुक्ल त्रयोदशी को कुबेर व्रत करने के अनेक विधान निर्दिष्ट हैं। इससे उपासक धनाढ्य तथा सुख−समृद्धि से संपन्न हो जाता है और परिवार में आरोग्य प्राप्त होता है। सारांश में कहा जा सकता है कि कुबेर की उपासना ध्यान से मनुष्य का दुःख दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर के भक्त की सभी आपत्तियों से रक्षा होती है और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान−वैराग्य आदि के साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से संनिविष्ट हो जाते हैं।
अब सब प्रकार की सिद्धि देन वाले कुबेर के मन्त्र को कहता हूँ👉
‘यक्षाय’ पद बोलकर, ‘कुबेराय’, फिर ‘वैश्रवणाय धन’ इन पदों का उच्चारण कर ‘धान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिम में देहि दांपय’, फिर ठद्वय (स्वाहा) लगासे से यह ३५ अक्षरों का कुबेर मन्त्र निष्पन्न होता है ॥
इस मन्त्र के विश्रवा ऋषि हैं, बृहती छन्द है तथा शिव के मित्र कुबेर इसके देवता ॥
विमर्श 👉 कुबेरमन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिम मे देहि दापय स्वाहा।
विनियोग 👉 अस्य श्रीकुबेरमन्त्रस्य विश्रवाऋषिर्बृहतीच्छन्दः शिवमित्रं धनेश्वरो देवताऽत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ॥
मन्त्र के 3, 4, 5, 7, 8, वर्णों से षडङ्गन्यास करे । फिर अलकापुरी में विराजमान कुबेर का इस प्रकार ध्यान करे ॥
विमर्श 👉 न्यास विधि – यक्षाय हृदयाय नमः, कुबेराय शिरसे स्वाहा,
वैश्रवणाय शिखायै वषट्, धनधान्यधिपतये कवचाय हुम्,
धनधान्यसमृद्धिम मे नेत्रत्रयाय वौषट्, देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट् ॥
अब अलकापुरी में विराजमान कुबेर का ध्यान कहते हैं – मनुष्य श्रेष्ठ, सुन्दर विमान पर बैठे हुये, गारुडमणि जैसी आभा वाले, मुकुट आदि आभूषणों से अलंकृत, अपने दोनो हाथो में क्रमशः वर और गदा धारण किए हुये, तुन्दिल शरीर वाले, शिव के मित्र निधीश्वर कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ ॥
इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिए । तिलों से उसका दशांश होम करना चाहिए तथा धर्मादि वाले पूर्वोक्त पीठ पर षडङ्ग दिक्पाल एवं उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए ॥
अब काम्य प्रयोग कहते हैं 👉 धन की वृद्धि के लिए शिव मन्दिर में इस मन्त्र का दश हजार जप करना चाहिए । बेल के वृक्ष के नीचे बैठ कर इस मन्त्र का एक लाख जप करने से धन-धान्य रुप समृद्धि प्राप्त होती है ॥
कुबेर मंत्र को दक्षिण की और मुख करके ही सिद्ध किया जाता है👉
अति दुर्लभ कुबेर मंत्र इस प्रकार है👉 मंत्र :- "ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:।"
मन्त्र जप से पहले विनियोग करें :- "अस्य श्री कुबेर मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषि:वृहती छन्द: शिवमित्र धनेश्वरो देवता समाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोग:"
हवन :- तिलों का दशांस हवन करने से प्रयोग सफल होता है। यह प्रयोग शिव मंदिर में करना उत्तम रहता है। यदि यह प्रयोग बिल्वपत्र वृक्ष की जड़ों के समीप बैठ कर हो सके तो अधिक उत्तम होगा। प्रयोग सूर्योदय के पूर्व संपन्न करें।
"मनुजवाह्य विमानवरस्थितं गुरूडरत्नानिभं निधिनाकम्।
शिव संख युक्तादिवि भूषित वरगदे दध गतं भजतांदलम्।।"
कुबेर के अन्य सिद्ध विलक्षण मंत्र :-
अष्टाक्षर मंत्र :- "ॐ वैश्रवणाय स्वाहा:"
षोडशाक्षर मंत्र :- "ॐ श्री ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:।"
पंच त्रिंशदक्षर मंत्र :- "ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धनधान्या समृद्धि देहि दापय स्वाहा।"
श्री कुबेर पूजन जाप संक्षिप्त विधि
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श्रीधनदायक कुबेर यंत्र को लाल कपड़ा बिछाकर चौकी पर स्थापित करें इसके बाद शरीर और पूजन सामग्री एवं भूमि पवित्रीकरण के पश्चात सर्वप्रथम हाथ मे पुष्प लेकर ध्यान मंत्र बोले और यंत्र के ऊपर छोड़ दें इसके बाद घी का दीपक जलाकर आगे की प्रक्रिया करें।
ध्यान मंत्र :-
मनुज बाह्य विमान स्थितम्, गरूड़ रत्न निभं निधि नायकम्।
शिव सखं मुकुटादि विभूषितम्, वर गदे दधतं भजे तुन्दिलम्।।
इसके बाद यथा सामर्थ्य पंचोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजन कर यथा कामना मानसिक संकल्प से संकल्प के बाद हाथ या आचमनी में जल लेकर विनियोग मंत्र पढ़ भूमि पर गिरा दें।
कुबेर मन्त्र👉 विनियोग - ॐ अस्य मन्त्रस्य विश्रवा ऋषि:, वृहती छन्द:, कुबेर: देवता, सर्वेष्ट-सिद्धये जपे विनियोग:। ऋष्यादि-न्यास - विश्रवा-ऋषये नम: शिरसि, वृहती-छन्दसे नम: मुखे, कुबेर-देवतायै नम: हृदि। सर्वेष्ट-सिद्धये जपे विनियोगाय नम:
सर्वांगे षडग्-न्यास
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कर-न्यास
अग्-न्यास
ॐ यक्षाय
अंगुष्ठाभ्यां नम:
हृदयाय नम:
ॐ कुबेराय
तर्जनीभ्यां स्वाहा
शिरसे स्वाहा
ॐ वैश्रवणाय
मध्यमाभ्यां वषट्
शिखायै वषट्
ॐ धन-धान्यधिपतये
अनामिकाभ्यां हुं
कवचाय हुं
ॐ धन-धान्य-समृद्धिं मे
कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्
नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ देही दापय स्वाहा
करतल करपृष्ठाभ्यां फट्
अस्त्राय फट्
न्यास की प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद इन तीनों में से किसी भी एक मंत्र का जप आज से ही आरम्भ करें तथा दस हजार होने पर दशांश हवन करें या एक हजार मंत्र अधिक जपें। इससे यंत्र भी सिद्ध हो जाता है। वैसे सवालाख जप करके दशांश हवन करके कुबेर यंत्र को सिद्ध करने से तो अनंत वैभव की प्राप्ति हो जाती है।
कुबेर देव को धन का देवता माना जाता है। वे देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, इनकी कृपा से किसी को भी धन प्राप्ति के योग बन जाते हैं। कुबेर को प्रसन्न करने का सुप्रसिद्ध मंत्र इस प्रकार है-
कुबेर देव का मंत्र👉 "ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय, धन धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।"
धन्वंतरि स्तोत्र
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ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
यह देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव का अमोघ मंत्र एवं स्तोत्र है। इस मंत्र का तीन माह तक रोज 108 बार या इससे अधिक जप करें स्तोत्र पाठ को भी कम से कम 3,5 या 11 पर बढ़े। जप, पाठ करते समय अपने सामने एक कौड़ी (धनलक्ष्मी कौड़ी) रखें। तीन माह के बाद प्रयोग पूरा होने पर इस कौड़ी को अपनी तिजोरी या लॉकर में रख दें। ऐसा करने पर कुबेर देव की कृपा से आपका लॉकर कभी खाली नहीं होगा। हमेशा उसमें धन भरा रहेगा।
अब मन को एकाग्र करके हनुमान चालीसा का पाठ करें। यदि हनुमान चालीसा का पूर्ण पाठ नहीं कर पा रहे हों तो इन पंक्तियों का पाठ करें :-
"जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोबिद कहि सके कहां ते।।"
इन पंक्तियों के निरंतर जप से हनुमानजी तो प्रसन्न होंगे ही साथ ही यम, कुबेर आदि देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होगी।
दैनिक जाप एवं पाठ पूर्ण होने पर भूमि पर जल गिरा कर माथे से लगाये तथा प्रणाम कर उठ जाए साधना काल मे प्रत्येक दिन यही प्रक्रिया दोहराए।
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धनतेरस ( धन्वन्तरि त्रयोदशी)को "कुछ" नया खरीद कर घर लाना चाहिए- यह पूर्ण सत्य नहीं है, अपितु अर्ध सत्य है। पूरा सत्य यह है कि आप क्या क्रय कर रहें हैं— इस पर निर्भर है— लक्ष्मी का आगमन या निर्गमन। इस पवित्र दिन को यदि कुछ खरीदना ही है तो कुछ विशेष वस्तुएँ ही खरीदनी चाहिए, न कि कुछ भी। रत्नों में हीरा,पन्ना,माणिक,पुखराज ,मोती आदि ही खरीदें। नीलम,गोमेद लहसुनियाँ कदापि न लें। धातुओं में सोना, चाँदी, तांबा, पीतल, काँसा।
आजकल लोग स्टील, हंडालियम और फाइवर के युग में इसे भी खरीद कर धनतेरस मना लेते हैं। कार, बाइक,, टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल आदि भी खरीदने का खूब प्रचलन है। ये सब राहु और शनि की वस्तुयें हैं। सूर्य, चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र की वस्तुयें ही खरीदें। राहु, शनि, मंगल की वस्तुओं से दूर रहें तो अच्छा है। उन्हें आवश्यकतानुसार कभी बाद में खरीदें, धनतेरस से भाई दूज तक कदापि नहीं। थोड़ा और गहराई से इस बात को समझना चाहें तो कह सकता हूँ कि जन्मकुण्डली के अनुसार विचार भी कर लिया जाय तो अति उत्तम। कहीं आप द्वितीयेश, सप्तमेश, षष्ठेश, अष्ठमेश, द्वादशेश आदि मारकेश ग्रहों की वस्तुयें तो नहीं खरीद रहे हैं— इस बात का ज्ञान और ध्यान रखना आवश्यक है। अन्यथा सम्पत्ति के भ्रम में आप विपत्ति को आमन्त्रित कर रहे होते हैं।
१. प्रातः धन्वन्तरि पूजन करें। स्वर्ण, आमला , मधु, ब्राह्मी , आदि पवित्र औषधियाँ ग्रहण करें।
२. सायं काल यम को दीप दान अवश्य करें।
३. स्थिर लग्न मुहूर्त में उचित वस्तु का क्रय करें। साभार.

डेढ़ लाख साल पुराना है बिहार का ये सूर्य मंदिर,

 #छठ_पर्व : डेढ़ लाख साल पुराना है बिहार का ये सूर्य मंदिर, भगवान विश्वकर्मा ने किया था निर्माण

हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। इस बार 28 अक्तूबर से छठ पूजा की शुरुआत होगी और 31 अक्तूबर को इसका समापन होगा। छठ पूजा के दिन भगवान सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा होती है। इस दौरान 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास रखा जाता है। कार्तिक माह की चतुर्थी तिथि को पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूर्य और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
मुख्य रूप से छठ पर्व उत्तर भारत के राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन अब यह त्योहार पूरी दुनिया में मनाए जाने लगा है। छठ के पर्व में उगते और डूबते हुए सूर्य दोनों को अर्घ्य देते हैं। छठ महापर्व में विशेष रूप से भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। छठ महापर्व के मौके पर हम देश के एक अद्भुत और चमात्कारिक सूर्य मंदिर के बारे में बताते हैं....
देशभर में भगवान सूर्य के कई प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर हैं। इन सूर्य मंदिरों में सबसे पहले कोणार्क के सूर्य मंदिर का नाम आता है, लेकिन बिहार में एक सूर्य मंदिर स्थित है जो लोगों के आस्था का केंद्र है। राज्य के औरंगाबाद जिले में स्थित यह बेहद रहस्यमयी मंदिर है। छठ महापर्व पर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जमा होती है। इस मंदिर में छठ पूजा करने के लिए यहां पर बिहार के अलावा कई राज्यों के लोग आते हैं।
हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, इस प्राचीन सूर्य मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने खुद एक रात में किया था। देश का यह पहला ऐसा मंदिर है जिसका दरवाजा पश्चिम दिशा की तरफ है। इस मंदिर में सात घोड़े वाले वाले रथ पर भगवान सूर्य सवार हैं।
इस प्रसिद्ध मंदिर में भगवान सूर्य के तीनों रूपों उदयाचल-प्रात: सूर्य, मध्याचल- मध्य सूर्य और अस्ताचल -अस्त सूर्य के रूप में प्रतिमा स्थापित है। बताया जाता है कि छठ पूजा की शुरुआत यहीं से हुई थी। छठ पूजा में इस मंदिर का काफी महत्व है।
डेख लाख वर्ष पहले हुआ था मंदिर का निर्माण
यह मंदिर करीब एक सौ फीट ऊंचा है। इसके साथ ही यह प्राचीन मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण डेढ़ लाख साल पहले किया गया था। आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार पत्थर से इस मंदिर को बनाया गया है। इसके निर्माण में गारा या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ है। अभी तक यह रहस्य है कि इस मंदिर का एक रात में कैसे निर्माण किया गया।
यह प्राचीन सूर्य मंदिर विशिष्ट कलात्मक भव्यता के अलावा अपने इतिहास के लिए भी जाना जाता है। डेढ़ लाख वर्ष पुराना यह सूर्य मंदिर औरंगाबाद से करीब 18 किलोमिटर दूर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण काले और भूरे पत्थरों से किया गया है। यह सूर्य मंदिर देखने में ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की तरह नजर आता है।
सूर्य मंदिर के बाहर स्थित एक शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि में एक श्लोक लिखा है। इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में किया गया था। शिलालेख पर लिखे श्लोक के मुताबिक, इस पौराणिक मंदिर के निर्माण को 1 लाख 50 हजार 19 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
आर्टिकल - अमर उजाला
दिनांक - २७.१०.२०२२

ब्राह्मण में ऐसा क्या है

 ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सारी

दुनिया ब्राह्मण के पीछे पड़ी है।
इसका उत्तर इस प्रकार है।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी
ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री
परशुराम जी से कहा कि →
"देव एक गुन धनुष हमारे।
नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे।।"
हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण
अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में
परम पवित्र 9 गुण है-
ब्राह्मण_के_नौ_गुण :-
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।
● रिजुः = सरल हो,
● तपस्वी = तप करनेवाला हो,
● संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट,
रहनेवाला हो,
● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो,
● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में
रखनेवाला हो,
● दाता= दान करनेवाला हो,
● शूर = बहादुर हो,
● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो,
● ब्रह्मज्ञानी,
श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय
के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण
इस प्रकार बताए गये हैं-
" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्।।"
अर्थात-मन का निग्रह करना ,इंद्रियों को वश
में करना,तप( धर्म पालन के लिए कष्ट सहना),
शौच(बाहर भीतर से शुद्ध रहना),क्षमा(दूसरों के
अपराध को क्षमा करना),आर्जवम्( शरीर,मन
आदि में सरलता रखना,वेद शास्त्र आदि का
ज्ञान होना,यज्ञ विधि को अनुभव में लाना
और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव
रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।
पूर्व श्लोक में "स्वभावप्रभवैर्गुणै:
"कहा इसलिएस्वभावत कर्म बताया है।
स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है।फिर जन्म के
बाद संग मुख्य है।संग स्वाध्याय,अभ्यास आदि
के कारण स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।
दैवाधीनं जगत सर्वं , मन्त्रा धीनाश्च देवता:।
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना: , तस्माद् ब्राह्मण देवता:।।
धिग्बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्व शस्त्राणि हतानि च।।
इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं त्याग तपस्या
गायत्री सन्ध्या के बल से और आज लोग उसी
को त्यागते जा रहे हैं,और पुजवाने का भाव
जबरजस्ती रखे हुए हैं।
*विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
*वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
*तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
*छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*
भावार्थ -- वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण
एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल(जड़)
दिन के तीन विभागों प्रातः,मध्याह्न और सायं
सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या(गायत्री
मन्त्र का जप) करना है,चारों वेद उसकी
शाखायें हैं,तथा वैदिक धर्म के आचार
विचार का पालन करना उसके पत्तों के
समान हैं।
अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,,
इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें,
क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो
शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे।।
पुराणों में कहा गया है ---
विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।
जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ
देवता भी निवास करते हैं।
अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय
भी शून्य हो जाते हैं।
इसलिए .......
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।
श्री कृष्ण ने कहा-ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो,
तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा
वह हर अवस्था में कल्याण ही करता है।
ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्......
वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं।
इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही
शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि,
विप्र प्रसादात् धरणी धरोहमम्।
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम।
विप्र प्रसादात् अजिता जितोहम्।
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।
ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने
धरती को धारण कर रखा है।
अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष
कैसे उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद
से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान
में प्राप्त किया है,इन्ही के आशीर्वाद से मैं
हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के
आशीर्वाद से ही मेरा नाम राम अमर हुआ है,
अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।
और ब्राह्मणों काअपमान ही कलियुग
में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।
राधे राधे

कुशा

 #कुशा जिसे सामन्य घांस समझा जाता है उसका बहुत ही बड़ा महत्व है , कुशा के अग्र भाग जोकी बहुत ही तीखा होता है इसीलिए उसे कुशाग्र कहते हैं l

कुशा महिलाओं की सुरक्षा करनें में राम बाण है जब लंका पति रावण माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका ले गया , उसके बाद वह बार बार उन्हें प्रलोभित करने जाता था और माता सीता "इस कुशा को अपना सुरक्षा कवच बनाकर "" उससे बात करती थी , जिसके कारण रावण सीता के निकट नहीं पहुँच सका l
आज भी मातृ शक्ति अपने पास कुशा रखे तो अपने सतीत्व की रक्षा सहज रूप से कर सकती है क्योंकि कुशा में वह शक्ति विद्यमान है जो माँ बहिनों पर कुदृष्टि रखने वालों को उनके निकट पहुंचने भी नहीं देती l
जो माँ या बहिन मासिक विकार से परेशान है उन्हें कुशा के आसन और चटाई का विशेष दिनों में प्रयोग करना चाहीये .
पूजा-अर्चना आदि धार्मिक कार्यों में कुश का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। यह एक प्रकार की घास है, जिसे अत्यधिक पावन मान कर पूजा में इसका प्रयोग किया जाता है।
महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं। एक का नाम कद्रू था और दूसरी का नाम विनता। कद्रू और विनता दोनों महार्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं।
महार्षि कश्यप ने उनकी सेवा-भावना से अभिभूत हो वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने कहा, मुझे एक हजार पुत्र चाहिए। महार्षि ने ‘तथास्तु’ कह कर उन्हें वरदान दे दिया। विनता ने कहा कि मुझे केवल दो प्रतापी पुत्र चाहिए। महार्षि कश्यप उन्हें भी दो तेजस्वी पुत्र होने का वरदान देकर अपनी साधना में तल्लीन हो गए।
कद्रू के पुत्र सर्प रूप में हुए, जबकि विनता के दो प्रतापी पुत्र हुए। किंतु विनता को भूल के कारण कद्रू की दासी बनना पड़ा।
विनता के पुत्र गरुड़ ने जब अपनी मां की दुर्दशा देखी तो दासता से मुक्ति का प्रस्ताव कद्रू के पुत्रों के सामने रखा। कद्रू के पुत्रों ने कहा कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे।
गरुड़ ने उनकी बात स्वीकार कर अमृत कलश स्वर्ग से लाकर दे दिया और अपनी मां विनता को दासता से मुक्त करवा लिया।
यह अमृत कलश ‘कुश’ नामक घास पर रखा था, जहां से इंद्र इसे पुन: उठा ले गए तथा कद्रू के पुत्र अमृतपान से वंचित रह गए।
उन्होंने गरुड़ से इसकी शिकायत की कि इंद्र अमृत कलश उठा ले गए। गरुड़ ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं, हां यदि तुम सब उस घास (कुश) को, जिस पर अमृत कलश रखा था, जीभ से चाटो तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा।
कद्रू के पुत्र कुश को चाटने लगे, जिससे कि उनकी जीभें चिर गई इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई दिखाई पड़ती है.l
‘कुश’ घास की महत्ता अमृत कलश रखने के कारण बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।
जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे महान असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए।
कुश ऊर्जा की कुचालक है। इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधन की शक्ति का क्षय नहीं होता। परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।
वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।
कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है। इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है।
हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश (विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसका धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक कारण भी है।
कुश जब पृथ्वी से उत्पन्न होती है तो उसकी धार बहुत तेज होती है। असावधानी पूर्वक इसे तोडऩे पर हाथों को चोंट भी लग सकती है।
पुरातन समय में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें कुश लाने का कहते थे। कुश लाने में जिनके हाथ ठीक होते थे उन्हें कुशल कहा जाता था अर्थात उसे ही ज्ञान का सद्पात्र माना जाता था।
#वैज्ञानिक शोधों से यह भी पता चला है कि कुश ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन तथा पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं तथा भोजन व पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता।
पांच वर्ष की आयु के बच्चे की जिव्हा पर शुभ मुहूर्त में कुशा के अग्र भाग से शहद द्वारा सरस्वती मन्त्र लिख दिया जाए तो वह बच्चा कुशाग्र बन जाता है।
कुश से बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान तथा पूजन आदि धार्मिक कर्म-कांडों से प्राप्त ऊर्जा धरती में नहीं जा पाती क्योंकि धरती व शरीर के बीच कुश का आसन कुचालक का कार्य करता है।

वाणी_के_१८_दोष

 

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सामान्य हम मनुष्यों की वाणी में गुणों के साथ दोषों की भी संभावना रहती है । शास्त्र , संत , विद्वान और ज्ञानीजन कहते - हैं कि वाणी की प्रेरिका बुद्धि है । इस क्रम में सामान्य वाणी के 18 दोष कहे गए हैं ।
🔸(१) पहला दोष है — अपेतार्थ ( निरर्थक शब्दजाल ) अर्थात निरर्थक वाणी बोलना ।
🔹(२) दूसरा दोष है— अनेक वाक्यों में एक ही भाव को बार - बार दोहराते चले जाना ।
🔸(३) तीसरा दोष है — अशुद्ध - अश्लील वाणी का प्रयोग ।
🔹(४) चौथा दोष है - आवश्यकता से अधिक कहना ।
🔸(५) पाँचवाँ दोष है - बहुत विस्तार से कहना ।
🔹(६) छठा दोष है – कटु वचन कहना ।
🔸(७) सातवाँ दोष है - संदिग्ध वाणी में कहना ।
🔹(८) आठवाँ दोष है - दीर्घांत पदोच्चारण करना ।
🔸(९) नवाँ दोष है — श्रोता से मुँह फेरकर बोलना ।
🔹(१०) दसवाँ दोष है - असत्य बोलना ।
🔸(११) ग्यारहवाँ दोष है – त्रिवर्ग के अथवा चतुर्वर्ग (धर्म - अर्थ - काम - मोक्ष ) के विरुद्ध बोलना ।
🔹(१२) बारहवाँ दोष है- कर्णकटु यानी कडुए शब्दों का वार्त्तालाप में प्रयोग करना ।
🔸(१३) तेरहवाँ दोष है- कठिनता से उच्चारण करने योग्य शब्दों को कहना |
🔹(१४) चौदहवाँ दोष है- उलटे - पलटे ढंग से यानी विपर्यस्त क्रम में अपनी बात कहना ।
🔸(१५) पंद्रहवाँ दोष है - अत्यंत न्यून अर्थात आवश्यकता से बहुत कम में कहने की चेष्टा करना , जिससे श्रोता कुछ समझ ही न पाए , ऐसी वाणी बोलना ।
🔹(१६) सोलहवाँ दोष है - अकारण यानी बिना किसी कारण के ही बोलना ।
🔸(१७) सत्रहवाँ दोष है - निष्प्रयोजन यानी बिना किसी उद्देश्य के ही बोलना , एवं...
🔹(१८) अठारहवाँ दोष है - अनर्गल वाणी का प्रयोग करना
🔘2. क्रोध ,
🔘3. लोभ ,
🔘4 . भय ,
🔘5. दैन्य ,
🔘6. अनार्यता ,
🔘7. हीनता ,
🔘8. गर्व एवं
🔘9. दया से गद्गद होकर बोलना
ये नौ दुर्बुद्धिजन्य वाक्य दोष हैं । श्रोता या वक्ता इन दोनों में से ही किसी के भी कपटपूर्वक भाषण करने से यथार्थ बात छिपी ही रह जाती है । अतः शुद्ध रीति से अंतर्हदय की बात कहना ही उचित है ।
इसके अतिरिक्त अन्य ग्रंथों में , जो वाणी के गुण कहे गए हैं ; वो इस प्रकार हैं- श्लेष , प्रसाद , समता , मधुरता , सौकुमार्य , अर्थ की सुस्पष्टता , कांति , उदारता , उदात्तता , ओज , ऊर्जस्वलता , प्रियता , श्रेष्ठ शब्द , समाधि , सूक्ष्मता , गंभीरता , अर्थ की व्यापकता , संक्षेप में बहुत कहने की शैली , भाविकता , गति , रीति , उक्ति एवं प्रौढ़ि - ये वाणियों के गुण हैं !!

राम तत्त्व की अद्भुत महिमा !

 राम तत्त्व की अद्भुत महिमा !

अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं, ऐसी बात नहीं है । राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
'जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम'।'
एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
इस कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?"
"थोड़ी साधना करो, जप-ध्यानादि करो, फिर समझ में आ जायेगा।"
जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?"
साधना आदि करके मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः
वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।
रोम-रोम में रमने वाला
चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम"
वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए,
कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे।
आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः 'अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।' कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी।
सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।' किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः "जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?"
यह सुनकर रावण बोलाः "मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।"
धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है।
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हे राम ! हे हरि ! हे अच्युत ! गोविंद ! दीनदयाल ! हम सभी को सदबुद्धि दे। हम संयमी, सदाचारी बनकर आत्मदेव को पा लें। हे अंतरात्मा ! हे परमात्मा ! हे दीनबंधु ! हे भक्तवत्सल ! ॐ प्रभु जी ॐ.....' ऐसा पुकारते, प्रार्थना करते डूब जायें। वे कृपालु अवश्य कृपा करते हैं l
आभार सहित 🌷🌷🙏