रविवार, 30 अक्टूबर 2022

मै अगर बौद्ध धर्म को अपनाना चांहू तो आप मुझे किस जाति का बौद्ध बनाओगे ॽ

 मै अगर बौद्ध धर्म को अपनाना चांहू तो आप मुझे किस जाति का बौद्ध बनाओगे ॽॽॽ

● ऊँची जाति वाले सवर्ण बौद्ध ॽॽॽ
● सामान्य जाति के बौद्ध ॽॽॽ
या
● फिर नीच कुजात अछूत जाति के बौद्ध ॽॽॽ
क्या कहा !!
बौद्ध में जाति-भेद नहीं होता ?
तो फिर ये
▪हीनयान
▪महायान
▪वज्रयान
▪भीमयान
▪थेरवाड
▪त्रिलोक
▪गरा
▪दरा
▪बेता
▪बेदा
▪फल्पा
▪थल्पा
▪दोम्बा
▪जोम्बा
▪बोडो
▪नोनो
क्या होते हैं ???
या फिर आप मुझे नीच, कुजात, अछूत, जाती का बौद्ध बनाओगे
--जैसे कि
▪बुराकुमिन
▪पयाक्युन
▪यांग्बान
▪बीकजोंग
▪जिआंमिन
▪रोधियास
▪राग्यब्पा
▪वज्रधरा
▪मोन
▪गराबा
यह तो बौद्ध धर्म की ऐसी अछूत जातियाँ हैं जिनका किसी भी बौद्ध मंदिर में प्रवेश तक वर्जित है तो बौद्ध भिक्षु बनना तो बहुत दूर की बात है। ? भगवान बुद्ध के जन्मदिन को
हम सब बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जानते हैं
भगवान बुद्ध को मानने वाले लोग बुद्ध धर्म का प्रचार और प्रसार प्रारंभ करते ही हिन्दू धर्म के विरोध स्वरूप बौद्ध धर्म को खड़ा करने लगे
भगवान बुद्ध ने अपनी किसी भी उपदेशना में हिंदू धर्म के विरुद्ध ना तो कोई बात कही है और न ही उन्होंने हिंदू धर्म की किसी रीति या संस्कार की कोई बुराई की है
भगवान् बुद्ध ने तो सिर्फ यह कहा की दुनिया
में क़स्ट है और कष्टों का निराकरण होना है
उन्होंने कष्टों के निराकरण के लिए 4 आर्यसत्य बताए
पहला दुख---उनका कहना था संसार में दुख है दूसरा समुदय-- उनका कहना था की दुख का कारण है
तीसरा निरोध-- उनका कहना था की दुख के निवारण है
चौथा है मार्ग-- जो दुखों के निवारण के लिए अव्यंगिक मार्ग है
भगवान बुद्ध ने आर्य सत्य के निराकरण
के लिए अष्टांग मार्ग की बात की और उन्होंने
कहा कि
सम्यक दृष्टि
सम्यक संकल्प
सम्यक वाक
सम्यक कर्म
सम्यक जीविका
सम्यक प्रयास
सम्यक स्मृति
सम्यक समाधि
जिनके माध्यम से इन दुखों का निराकरण कर सकते हैं
भगवान बुद्ध ने स्वयंमोक्ष प्राप्त करने के लिए साधना के मार्ग को अपनाया और साधना के मार्ग में उन्होंने सनातन धर्म की कुछ संकल्पनाओं का प्रचार किया
जिसमें अग्निहोत्र,गायत्री मंत्र,ध्यान,अंतर्दृष्टि
मध्य मार्ग का अनुसरण करना प्रमुख हैं
लेकिन दुर्भाग्य रहा कि भगवान बुद्ध के बताए
हुए मार्ग पर चलने का दावा करने वाले उनके अनुयायी ने भगवान बुद्ध के मार्ग को हिन्दुओं के विरोध के स्वरूप समाज में स्थापित करने का प्रयास किया और जो लंबे समय तक चला तथा भगवा के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया गया जबकि स्वान बौद्धभिक्षु भगवा से मिलता जुलता ही वस्त्र पहनते हैं और खुद दलाईलामा जी जो बौद्ध धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु हैं और वह भगवान शिव की पूजा करते हुए दिखाई देते हैं लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले बौद्ध धर्म के राजाओं ने बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म के विरुद्ध स्थापित किए जाने के लगातार प्रयास किए और सनातन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया
आज़ादी के बाद जब बाबा साहेब अंबेडकर
ने बौद्ध धर्म को अपनाया तो उसके बाद एक नए प्रकार का बौद्ध धर्म को कुछ लोगों के द्वारा प्रचारित किया गया जिसमें जय भीम का नारा दिया गया जिसमें नीले वस्त्रों का और नीले झंडे का प्रयोग किया जाने लगा और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि वो सारे के सारे लोग समाज के निचले तबके को बाबा साहब के नाम पर हिंदू धर्म के विरुद्ध भड़काने का काम करते रहे
मैं बौद्ध धर्म
के अपनाने वालों से एक बात पूछना चाहता हूँ कि भगवान बुद्ध ने अपनी किसी भी उपदेशना में हिंदू धर्म के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई बात कही हो तो उसे लोगों के सामने लाना चाहिए और मैं विश्वास के साथ ही यह कहता हूँ भगवान बुद्ध ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही
इसीलिए भगवान बुद्ध का उल्लेख
8 पुराणों में वर्णित है जिसमें उन्हें भगवान
विष्णु का नौंवा अवतार माना गया
वो पुराण है
हरिवंश पर्व
विष्णु पुराण
भागवत पुराण
गरुड़ पुराण
अग्नि पुराण
नारदीय पुराण
लिंग पुराण और पद्मपुराण
भगवान बुद्ध
जो अग्निहोत्र को मानते है
जो गायत्री मंत्र को मानते है
जो साधना के मार्ग से मोक्ष प्राप्त करने की बात
करते है वह हमारे हैं

माइग्रेन व पथरी की समस्या और मैग्नीशियम

 माइग्रेन व पथरी की समस्या और मैग्नीशियम

मुझे 2006 से 2014 तक हर 10-15 दिन में कभी भी भयंकर माइग्रेन का दर्द हो जाता था. कभी किसी यात्रा के कारण सुबह बहुत जल्दी जागना, कभी किसी कारण नाश्ता न कर पाना और फिर लंच भी लेट हो जाना, कभी शाम को अंधेरा होने के बाद घंटे भर से अधिक ड्राइविंग करना -ऐसे किसी भी कारण से बहुत तेज सिरदर्द हो जाता था और फिर कोई पेनकिलर लेकर सोने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता था.
फिर विटामिनों की जानकारी लेने के शौक के कारण मेरी पत्नी ने इंटरनेट पर इस विषय में पढ़ा कि अधिकतर लोगों में ऐसा मैग्नीशियम की कमी से भी होता है. उन्होंने मुझे रोज सुबह उठते ही मैग्नीशियम देना शुरु किया. पहले तो माइग्रेन की frequency कम हुई. फिर धीरे धीरे ऐसा हो चुका है कि पिछले 4-5 वर्ष में शायद कुल 2-3 बार ही माइग्रेन का दर्द हुआ है. पर अब जब ये दर्द होता भी है तो पहले की तरह बहुत अधिक नहीं होता, इसलिये दर्द के समय भी आवश्यक होने पर कोई कार्य कर पाता हूँ, ड्राइविंग भी कर पाता हूँ. जबकि पहले दर्द के समय कुछ करना सम्भव ही नहीं हो पाता था.
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अगर आप भी माइग्रेन से अक्सर परेशान रहते हैं तो होम्योपैथी की मैग्नीशियम Magnesia Phosphorica 6x की 7-8 टैबलेट रोज सुबह खाली पेट लीजिये. इससे महीने भर में ही माइग्रेन में काफी आराम आ जायेगा और 2-3 महीने बाद माइग्रेन से मुक्ति ही मिल जायेगी.
इस होम्योपैथी की मैग्नीशियम के कोई साइड इफैक्ट नहीं होते हैं. हां, कुछ अन्य लाभ अवश्य हैं. यह पथरी (stones) को भी समाप्त करता है. दरअसल हमारे शरीर में पथरी तभी बनती है जब हमारे शरीर में किसी कारण से कैल्सियम का प्रयोग सही से नहीं हो पाता है और वो एकत्रित होकर पथरी में बदल देता है. मैग्नीशियम उसी पथरी को धीरे धीरे पावडर में बदलने पर और मूत्र के साथ में शरीर से बाहर निकलने पर मजबूर कर देता है.
माइग्रेन व पथरी के लिये प्रयोग करके देखिये.
और हां
जय हिंद

आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध..! ?

 आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध..!

हमारे अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की। कुछ वामपंथी लेखकों ने तो बुद्ध को मानो कार्ल मार्क्स का पूर्व-रूप जैसा दिखाने का यत्न किया है। मानो वर्ग-विहीन समाज बनाने का विचार बुद्ध से ही शुरू हुआ देखा जा सकता है, आदि।
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लेकिन यदि गौतम बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा हो। उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।
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एक बार जब गौतम बुद्ध के मित्र प्रसेनादी को पता चला कि उन की पत्नी पूरी शाक्य नहीं, बल्कि एक दासी से उत्पन्न शाक्य राजा की पुत्री है, तब उस ने उस का और उस से हुए अपने पुत्र का परित्याग कर दिया। किन्तु बुद्ध ने अपने मित्र को समझा कर उस का कदम वापस करवाया। तर्क यही दिया कि पंरपरा से संतान की जाति पिता से निर्धारित होती है, इसलिए शाक्य राजा की पुत्री शाक्य है। यदि बुद्ध को जाति-प्रथा से कोई विद्रोह करना होता, या नया मत चलाना होता, तो उपयुक्त होता कि वे सामाजिक, जातीय परंपराओं का तिरस्कार करने को कहते। बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं किया। कभी नहीं किया।
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बुद्ध का यह व्यवहार सुसंगत था। तुलनात्मक धर्म के प्रसिद्ध ज्ञाता डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने इस पर बड़ी मार्के की बात कही है कि जिसे संसार को आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो, वह सामाजिक मामलों में कम से कम दखल देगा। कोई क्रांति करना, नया राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाना तो बड़ी दूर की बात रही! एल्स्ट के अनुसार, ‘यदि किसी आदमी के लिए अपनी ही मामूली कामनाएं संतुष्ट करना एक विकट काम होता है, तब किसी कल्पित समानतावादी समाज की अंतहीन इच्छाएं पूरी करने की ठानना कितना अंतहीन भटकाव होगा!’
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अतः यदि बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था, तो यह तर्कपूर्ण था कि वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में कम-से-कम हस्तक्षेप करते। उन की चिन्ता कोई ‘ब्राह्मण-वाद के विरुद्ध विद्रोह’, राजनीतिक कार्यक्रम, आदि की थी ही नहीं, जो आज के मार्क्सवादी, नेहरूवादी या कुछ अंबेदकरवादी उन में देखते या भरते रहते हैं। इसीलिए स्वभावतः बुद्ध के चुने हुए शिष्यों में लगभग आधे लोग ब्राह्मण थे। उन्हीं के बीच से वे अधिकांश प्रखर दार्शनिक उभरे, जिन्होंने समय के साथ बौद्ध-दर्शन और ग्रंथों को महान-चिंतन और गहन तर्क-प्रणाली का पर्याय बना दिया।
धनतेरस और आवश्यक कृत्य:- क्या मंत्र पाठ और विग्रह पूजन ही आवश्यक है?
यह भी एक तथ्य है कि भारत के महान विश्वविद्यालय बुद्ध से पहले की चीज हैं। तक्षशिला का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गौतम बुद्ध के पहले से था, जिस में बुद्ध के मित्र बंधुला और प्रसेनादी पढ़े थे। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ पढ़े थे। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि बौद्धों ने उन्हीं संस्थाओं को और मजबूत किया जो उन्हें हिन्दू समाज द्वारा पहले से मिली थी। बाद में, बौद्ध विश्वविद्यालयों ने भी आर्यभट्ट जैसे अनेक गैर-बौद्ध वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया। इसलिए, वस्तुतः चिंतन, शिक्षा और लोकाचार किसी में बुद्ध ने कोई ऐसी नई शुरुआत नहीं की थी जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान, परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जा सकता हो।
धनतेरस विशेष:- लक्ष्मी- कुबेर के अर्द्ध विग्रह की पूजा और त्वरित लाभ
ध्यान दें, बुद्ध ने भविष्य में अपने जैसे किसी और ज्ञानी (‘मैत्रेय’, मित्रता-भाईचारा का पालक) के आगमन की भी भविष्यवाणी की थी, और यह भी कहा कि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा। यदि बुद्ध के लिए कुल, जाति और वंश महत्वहीन होते, तो वे ऐसा नहीं कह सकते थे। उन्होंने अपने मित्र प्रसेनादी को वही समझाया, जो सब से प्राचीन उपनिषद में सत्यकाम जाबालि के संबंध में तय किया गया था। कि यदि उस की माता दासी भी थी, तब भी परिस्थिति उस के पिता को ब्राह्मण कुल का ही कोई व्यक्ति दिखाती थी, अतः वह ब्राह्मण बालक था और इस प्रकार अपने गुरू द्वारा स्वीकार्य शिष्य हुआ। उसी पारंपरिक रीति का पालन करने की सलाह बुद्ध ने अपने मित्र को दी थी।
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इसीलिए वास्तविक इतिहास यह है कि पूर्वी भारत में गंगा के मैदानों वाले बड़े शासकों, क्षत्रपों ने गौतम बुद्ध का सत्कार अपने बीच के विशिष्ट व्यक्ति के रूप में किया था। क्योंकि बुद्ध वही थे भी। उन्हीं शासकों ने बुद्ध के अनुयायियों, भिक्षुओं के लिए बड़े-बड़े मठ, विहार बनवाए।
शनि यदि पाप फल देता है तो गुरु भी उससे ज्यादा अशुभ है.
जब बुद्ध का देहावसान हुआ, तब आठ नगरों के शासकों और बड़े लोगों ने उन की अस्थि-भस्मी पर सफल दावा किया थाः ‘हम क्षत्रिय हैं, बुद्ध क्षत्रिय थे, इसलिए उन के भस्म पर हमारा अधिकार है।’ बुद्ध के देहांत के लगभग आधी शती बाद तक बुद्ध के शिष्य सार्वजनिक रूप से अपने जातीय नियमों का पालन निस्संकोच करते मिलते हैं। यह सहज था, क्योंकि बुद्ध ने उन से अपने जातीय संबंध तोड़ने की बात कभी नहीं कही। जैसे, अपनी बेटियों को विवाह में किसी और जाति के व्यक्ति को देना, आदि।
दीपावली के इस विचित्र पर्व पर महाश्रीयंत्र की साधना और स्थापना
अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।
सिद्ध भैरवी यंत्र मंत्र और तंत्र l #god #shiv #kundali #वीडियो #tantra #strot #siddha #bhajan
पुराने बौद्ध विहारों, मठों, मंदिरों को भी देखें तो उन में वैदिक प्रतीकों और वास्तु-शास्त्र की बहुतायत मिलेगी। वे पुराने हिन्दू नमूनों का ही अनुकरण करते रहे हैं। बौद्ध मंत्रों में, भारत से बाहर भी, वैदिक मंत्रों की अनुकृति मिलती है। जब बुद्ध धर्म भारत से बाहर फैला, जैसे चीन, जापान, स्याम, आदि देशों में, तो यहाँ से वैदिक देवता भी बाहर गए। उदाहरण के लिए, जापान के हरेक नगर में देवी सरस्वती का मंदिर है। सरस्वती को वहाँ ले जाने वाले ‘धूर्त ब्राह्मण’ नहीं, बल्कि बौद्ध लोग थे!
श्रीयंत्र की महत्ता, अशुद्ध और शुद्ध की पहचान और विज्ञान! #shriyantra #yantra #tantra #god #shiv
अपने जीवन के अंत में बुद्ध ने जीवन के सात सिद्धांतों का उल्लेख किया था, जिन का पालन करने पर कोई समाज नष्ट नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने सुंदर उपन्यास ‘सप्त-शील’ (1960) में उसी को वैशाली गणतंत्र की पृष्ठभूमि में अपना कथ्य बनाया है। इन सात सदगुणों में यह भी हैं – अपने पर्व-त्योहार का आदर करना एवं मनाना, तीर्थ व अनुष्ठान्न करना, साधु-संतों का सत्कार करना। हमारे अनेक त्योहार वैदिक मूल के हैं। बुद्ध से समय भी पर्व-त्योहार अपने से पहले के ही थे। महाभारत में भी नदी किनारे तीर्थ करने के विवरण मिलते हैं। सरस्वती और गंगा के तटों पर बलराम और पांडव तीर्थ करने गए थे। अतः जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों की बात है, बुद्ध ने कभी पुराने व्यवहारों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। यदि कुछ कहा, तो उन का आदर और पालन करने के लिए ही। इस प्रकार, कोई विद्रोही या क्रांतिकारी होने से ठीक उलट, गौतम बुद्ध पूरी तरह परंपरावादी थे। उन्होंने चालू राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सलाह दी थी। वे आजीवन एक हिन्दू दार्शनिक रहे। डॉ. एल्स्ट के शब्दों में, ‘बुद्ध अपने पोर-पोर में हिन्दू थे।’ लेकिन ठीक इसी बात को नकारने के लिए बुद्ध धर्म की भ्रांत व्याख्या की जाती रही है। इसे परखना चाहिए।
क्या वर्तमान मे प्रचलित नवग्रह पूजन विधान सही हैं? नवग्रह्पुजन विधान तथा शनि एवं राजा दशरथ का युद्ध|
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#buddha #buddhism #बुध्द

मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था

 

👉🏾ईराक की एक पुस्तक है जिसे ईराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है।
आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में पाठ और भजन हुआ करता था।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5
अर्थात-
(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंद) तू धन्य है क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना।
(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ।
(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।
(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।
(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी प्राण गंवाने पड़े।
उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था।
‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है।
इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
”कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2। व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् –
(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो।
(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है।
(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।
(5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।

महाभारत भाइयों के प्रेम और साथ की कहानी है,जिसे हर व्यक्ति को पुन: पुन: पढना चाहिए:

महाभारत भाइयों के प्रेम और साथ की कहानी है,जिसे हर व्यक्ति को पुन: पुन: पढना चाहिए:

मत्स्य देश में यह सूचना वायु के पंखों पर सवार होकर आई कि राजकुमार उत्तर ने विशाल कुरु सेना को अकेले ही परास्त कर दिया है. जो गौवें कुरु सेना ने लूट ली थीं, वह सभी गायें स्वतंत्र होकर लौट आई थीं. कंक बने युधिष्ठिर, मत्स्य नरेश विराट को बल्लव अर्थात भीम के द्वारा सुशर्मा से मुक्त करा चुके थे. सुशर्मा ने मत्स्य नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली थी. स्वयं मत्स्य नरेश को इस बात पर हैरानी हो रही थी कि अंतत: यह क्या हो रहा है? उनका पुत्र उत्तर कैसे पराजित कर सकता है इतनी विशाल कुरु सेना को? और फिर उन्हें गर्व का अनुभव होने लगा. “मेरा पुत्र, मेरा किशोर पुत्र और द्रोण, भीष्म जैसे महायोद्धा और वह अकेला!” उनके हृदय में आनदं की हिलोरे उत्पन्न होने लगीं. तभी कंक ने कहा
“महाराज जीतना तो था ही, बृहन्नला जो गयी है, साथ! उसका साथ ही विजय का निश्चित होना है!”
नृत्य सिखाने वाली बृहन्नला का उल्लेख इस वीर कृत्य में आने के साथ महाराज क्रोधित हो गए. उन्होंने कहा “हे ब्राह्मण तनिक सम्हल कर बात करो. , बृहन्नला न ही तो पुरुष है और न ही स्त्री, वह क्या जिताएगी? क्या उसने कभी युद्ध भूमि का मुंह भी देखा है?”
बृहन्नला अर्थात अर्जुन के प्रति यह कटु वाक्य सुनते ही कंक पश्चाताप में डूब गए. उनके एक गलत कदम के कारण विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को इस भेष में रहना ही नहीं पड़ रहा था, अपितु दिव्यास्त्र प्राप्त अर्जुन को यह सब सुनना भी पड़ रहा था. परन्तु उन्होंने महाराज की बात पर ध्यान न दिया. वह पुन: बोले “नहीं महाराज! कई बार उसने अर्जुन के रथ का संचालन किया है! वह महारथी है!”
अब महाराज अपने युवा पुत्र के पराक्रम के सम्मुख उस नपुंसक बृहन्नला की अतिशय स्तुति से चिढ़ गए तथा उन्होंने जिन पासों से खेलते थे, वही कंक के मुख पर मार दिए! युधिष्ठिर अर्थात कंक के मुख से रक्त की धार बह निकली. सैरंध्री बनी द्रौपदी धर्मराज की यह स्थिति देखकर भागकर आई तथा रक्त की बूँद नीचे गिरने से पहले कटोरा रख दिया.
द्रौपदी के लिए अपने प्रिय युधिष्ठिर की देह से निकलने वाले रक्त को रोकना जितना आवश्यक था, उतना ही आवश्यक था कि , बृहन्नला को यह रक्त देखने से रोका जाए. क्योंकि उस बड़े भाई के मुख से बहता हुआ रक्त देखकर अर्जुन आपे में नहीं रह पाएंगे जिनका वह इतना आदर करते थे. जिनके एक गलत कदम पर बिना किसी विरोध के वह अपना वह राजपाट छोड़कर वन में चले आए थे, जो राजपाट उन्होंने स्वयं बनाया था. खांडवप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ इन्हीं पाँचों भाइयों और द्रौपदी ने बनाया था. भाइयों के मध्य यह सम्बन्ध भारत वर्ष के इतिहास की अद्भुत कहानी है. यह भाइयों के उस प्रेम की कहानी है, जिसमें बड़े भाई से प्रश्न तो किये, परन्तु बड़े भाई के विरोध में नहीं गए.
अर्जुन यदि अपने भाई के मुख से निकला हुआ रक्त देखेंगे तो अनर्थ हो जाएगा, इसलिए द्रौपदी भागकर जाती हैं और वहीं रोक लेती हैं.
कितना सरल था यह कह देना कि महाभारत को अपने घर में न रखिये क्योंकि इससे झगड़ा होगा! क्यों न रखें और क्यों न पढ़ें जिससे यह ज्ञात हो कि युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव में इतना प्रेम है कि वह एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते! वह यह नहीं कहते कि बड़े भैया ने द्यूत खेला था, हम तो वन नहीं जाएंगे? वह यह नहीं कहते कि हमारा अधिकार बने बनाए हस्तिनापुर पर है, हम उजाड़ खांडवप्रस्थ क्यों लें? बल्कि वह अपने पौरुष से खांडवप्रस्थ को मात्र इन्द्रप्रस्थ ही नहीं बनाते हैं बल्कि राजसूय यज्ञ कराकर युधिष्ठिर को सम्राट भी बनवाते हैं. जब अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव अपने इन्द्रप्रस्थ की सीमाओं का विस्तार अपने पौरुष से कर रहे थे, उस समय लिबरल की नजर में आदर्श कर्ण, किसी कोने में बैठकर उनकी इस विजय यात्रा के विषय में सुनकर अपनी कुंठा का विस्तार कर रहा था.
अर्जुन अपने भाई के मुख से निकला हुआ एक बूँद रक्त नहीं सहन कर सकते! वह प्रलय ला देंगे, और वह भी उस भाई के लिए जिनके कारण वह उस अवस्था में थे. परन्तु यह भाइयों का और द्रौपदी का प्रेम था, जिसमें उलाहना नहीं है, जिसमें तंज नहीं है! बस है तो एक दूसरे के प्रति समर्पित प्रेम!
जब उजाड़ खांडव प्रस्थ, इन्द्रप्रस्थ बना तो वह इन्हीं भाइयों का पुरषार्थ था, महाभारत की कहानी पाँचों भाइयों के प्रेम और पुरुषार्थ का हमारा इतिहास है!
यह घर उजाड़ने वाली पुस्तक नहीं है, युधिष्ठिर के धैर्य की कहानी है, युधिष्ठिर के धर्म की कहानी है. जितनी बार पढेंगे उतनी बार उसमें से मोती ही पाएंगे.
राज्य, वनवास, संघर्ष और फिर राज्य के बाद साथ की कहानी है

सबरीमला मंदिर

 जानिये और समझिये कि सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है।

केरल में सबरीमला के मशहूर स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं।
इस बात को समझने के लिये हमें केरल के इतिहास और यहां इस्लामी और राज्य में बीते 4-5 दशक से चल रही ईसाई धर्मांतरण की कोशिशों को भी समझना होगा।
मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था को तोड़ना है, ताकि इस पूरे इलाके में बसे लाखों हिंदुओं को ईसाई और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में लाया जा सके।
केरल में चल रहे धर्मांतरण अभियानों में सबरीमला मंदिर बहुत बड़ी रुकावट बनकर खड़ा है।
पिछले कुछ समय से इसकी पवित्रता और इसे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा था।
लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी।
लेकिन आखिरकार महिलाओं के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों ने न सिर्फ सबरीमला के अयप्पा मंदिर बल्कि पूरे केरल में हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है।
सबरीमला के इतिहास को समझिये...
1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे।
70 और 80 के दशक का यही वो समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिये थे।
उन्होंने सबसे पहला निशाना गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बनाया।
इस दौरान बड़े पैमाने पर यहां लोगों को ईसाई बनाया गया। इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही।
इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था।
सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं है किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता है।
सबरीमला में स्वामी अयप्पा को जागृत देवता माना जाता है।
यहां पूजा में जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है।
मान्यता है कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं जो लोग व्रत को ठीक ढंग से नहीं पूरा करते उन्हें यह दर्शन नहीं होते।
जिसे एक बार इस चंद्रमा के दर्शन हो गए माना जाता है कि उसके पिछले सभी पाप धुल जाते हैं।
सबरीमला से आया सामाजिक बदलाव...
सबरीमला मंदिर की पूजा विधि देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग और कठिन है।
यहां दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा दी जाती है इस दौरान रुद्राक्ष जैसी एक माला पहननी होती है।
साधक को रोज मंत्रों का जाप करना होता है।
इस दौरान वो काले कपड़े पहनता है और जमीन पर सोता है।
जिस किसी को यह दीक्षा दी जाती है उसे स्वामी कहा जाता है।
यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा इसके बजाय वो स्वामी कहलायेगा।
इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया।
मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाये।
ऐसे लोगों का समाज में बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है।
यानी यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वो उच्च स्थान देने का काम कर रहा था जो कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती है।
ईसाई मिशनरियों के लिये मुश्किल
सबरीमला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिये उन्होंने पाया कि जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वो भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमला मंदिर में ‘स्वामी’ के तौर पर दीक्षा ले ली।
यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था।
अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली है।
इन सभी ने भी मंदिर में रहकर दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा ली है इस दौरान उन्होंने चप्पल पहनना मना होता था और उन्हें भी उन्हीं रास्तों से गुजरना होता था जहां उनके साथ कोई रिक्शेवाला, कोई जूते-चप्पल बनाने वाला स्वामी चल रहा होता था।
नतीजा यह हुआ कि ईसाई संगठनों ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे।
ईसाई धर्म के इस फर्जीवाड़े के बावजूद सबरीमला मंदिर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही थी।
नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी।
यह याचिका कोर्ट में एक हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई।
1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था।
फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये।
उस वक्त आरएसएस के नेता जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था और वो इसमें सफल भी हुये थे।
इस आंदोलन के बदले में राज्य सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया था।
केरल में हिंदुओं पर सबसे बड़ा हमला
केरल के हिंदुओं के लिए यह इतना बड़ा मसला इसलिये है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है।
राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का उनके लिये यह आखिरी मौका है।
केरल में गैर-हिंदू आबादी तेज़ी के साथ बढ़ते हुए 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है।
अगर सबरीमला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं।
ऐसे में ‘चंद्र दर्शन’ कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी।
नतीजा धर्मांतरण के रूप में सामने आएगा।
यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि जिन तथाकथित महिला एक्टिविस्टों ने अब तक मंदिर में प्रवेश की कोशिश की है वो सभी ईसाई मिशनरियों की करीबी मानी जाती हैं।
जबकि जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है वो खुद ही उन्हें रोकने के लिये मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं।
साभार-कॉपीड अज्ञात लेखक से।