सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

धर्मपत्नी के भाई को #साला क्यों कहते हैं?

 #धर्मपत्नी के भाई को #साला क्यों कहते हैं? कितना श्रेष्ठ और सम्मानित होता है...

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हम प्रचलन की बोलचाल में साला शब्द को एक "गाली" के रूप में देखते हैं साथ ही "धर्मपत्नी" के भाई/भाइयों को भी "साला", "सालेसाहब" के नाम से इंगित करते हैं।
"पौराणिक कथाओं" में से एक "समुद्र मंथन" में हमें एक जिक्र मिलता है, मंथन से जो #14_दिव्य_रत्न प्राप्त हुए थे वो :
कालकूट (हलाहल),
ऐरावत,
कामधेनु,
उच्चैःश्रवा,
कौस्तुभमणि,
कल्पवृक्ष,
रंभा (अप्सरा),
महालक्ष्मी,
शंख (जिसका नाम साला था!),
वारुणी,
चन्द्रमा,
शारंग धनुष,
गंधर्व,
और अंत में अमृत।
"लक्ष्मीजी" मंथन से "स्वर्ण" के रूप में निकली थी, इसके बाद जब "साला शंख" निकला, तो उसे लक्ष्मीजी का भाई कहा गया!
दैत्य और दानवों ने कहा कि अब देखो लक्ष्मी जी का भाई साला (शंख) आया है ..
तभी से ये प्रचलन में आया कि नव विवाहिता बहु या धर्मपत्नी जिसे हम "गृहलक्ष्मी" भी कहते है, उसके भाई को बहुत ही पवित्र नाम साला कह कर पुकारा जाता हैं।
समुद्र मंथन के दौरान "पांचजन्य साला शंख" प्रकट हुआ, इसे भगवान विष्णु ने अपने पास रख लिया।
इस शंख को "#विजय_का_प्रतीक" माना गया है, साथ ही इसकी ध्वनि को भी बहुत ही शुभ माना गया है।
विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है।
अतः यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। इन्हीं कारणों से हिन्दुओं द्वारा पूजा के दौरान शंख को बजाया जाता है।
जब भी धन-प्राप्ति के उपाय करो "शंख" को कभी नजर अंदाज ना करे, लक्ष्मीजी का चित्र या प्रतिमा के नजदीक रखें।
जब भी किसी जातक का साला या जातिका का भाई खुश होता है तो ये उनके यहाँ "धन आगमन" का शुभ सूचक होता है और इसके विपरीत साले से संबंध बिगाड़ने पर जातक घोर दरिद्रता का जीवन जीने लगता है।
अतः साले साहब को सदैव प्रसन्न रखें
लक्ष्मी स्वयं चलकर आपके घर दस्तक देगी और है तो बनी रहेगी.......!!

रविवार, 30 अक्टूबर 2022

टेसू की पूर्णिमा

 


आज शरद पूर्णिमा ( टेसू की पूर्णिमा )
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जिन जिन ने बचपन में ये खेल खेला वे पुनः इसका आनंद लें और नई एवं युवां पीड़ी जो मेरे साथ फेसबुक पर जुड़ी है वे भी इस ग्वालियर बुंदेलखंड में खेले जाने वाले लोकरंजन का आनदं प्राप्त करें
अभी अनछुआ हुआ नहीं ये खेल अब भी ग्वालियर संभाग में ये कहीं कही किन्ही किन्ही मोहल्लों गलियों में देखने को मिल जाता है।
ग्वालियर का बीतता हुआ कल,,,धीरे धीरे जा रहा है समय के गर्त में ये लोकरंजनी बचपन का खेल
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वो भी रुपए साठ का
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टेसू आया टेशन से
वो भी बड़े फैशन से
कोट पहने टाट का
वो भी रुपए साठ का।
टाई बांधे रस्सी की
वो भी रुपए अस्सी की।
मेरा टेसू यहीं अड़ा
खाने को मांगे दही बड़ा...
और न जाने कितनी लम्बी
कहानी है इस टेसू की
विवाह से पहले।
टेसू का विवाह झांझी से
शरद पूर्णिमा पर होता है।
बच्चे हाथ में टेसू लिए
उसकी शादी का खर्च
जुटाने घर घर टेसू
की कथा सुनाने पहुँचते है।
जो दे उसका भला।
जो ना दे तो....
मेरा टेसू यहीं अड़ा....
हर परंपरा कुछ कहती है।
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मेर टेशु यही अडा खाने को मांगे दही बडा
धही बड़े मे पन्नी रख दो चार अठननी
अठननी मे खोट हैं, रख दो दस का नोट है।
दस के नोट मे खोट तो रख दो सो का नोट
सो के नोट कोई खेल नही हमारा तुम्हारा कोई मेल नही।
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ईमली की जड से निकली पतंग
सो सो मोती झलके रंग
एक रंग मेने मांग लिया
चढ घोडे सलाम किया
मारूँगा भाई मारूँगा
दिल्ली जात पुकारूँगा
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पानी पियो कीच को धरदयो नोट बीस को
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टेसू आया टेशन से रोटी खाई बेसन से ,
कोट पहना टाट का बो भी अस्सी साठ का
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जितने मुंह
उतने किस्से
मकसद एक ही
टेसू की शादी
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देश के कई स्थानों में ये ढिल्लु राजा के नाम से भी जाना जाता है।
ढिल्लु मतलब निठल्ला कोई काम धंधा नहीं इधर से उधर घूमना ओर अडोस पड़ोस के घरों में अर्थात झेन्जी के घर में ताका झांकी करना। और अपने बाबा के शे में रहना आखिर में बाबा का लाडला पोता जो हे ।
कहते हैं ना..... "बाबा जी का ठिल्लु"
टेसू - झेन्जी की शादी के तुरंत बाद मतलब जैसे ही फेरे होते तो लड़कियां टेसू तोड़ देती ओर उसकी आँखें जो कौड़ियों की बनी होतीं उनको नोंच कर निकालती आपस में छीना झपटी करती की कौड़ी उनमें से कौन लेगा।
ऐसा क्यों होता ?
ये शायद कोईं लोक - कथा के अंतर्गत होता होगा , कोई कहानी होनी चाहिये ?
ये आज तक नही पता। की क्या था ?
कोईं आल्हा - ऊदल , नल - दयमंती की तरह की कोई प्रेम कथा रही होगी लोक कथाओं में !!!
समय के गर्त में विस्मृत हे।
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सूअटा नाम का दानव टेसू ओर झेँझी की शादी नहीं होने देना चाहता इसलिये दोनो को तोड़ देता है।
खैर जो भी है मधुर यादे हे 4 G के युग में उम्मीद करता हूँ की 8 G, 9G, 10 G आदि के आने के बाद भी ये सब मौजूद रहे।
और मेरा टेसूं यहीं अड़ा रहे।
और झेंजी के घर में ताक-झाँक करता आनंद लेता रहे।
टेसू झेन्जी का इतिहास
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
देश के कई भागों में -टेसू और झैन्जी -का एक विशेष परंपरागत पर्व ...आज विजयदशमी से शरदपूर्णिमा तक मनाया जाता है जिसमें दोनों की धूमधाम से शादी की जाती है ...आइये इसे विस्तार से जाने ...
टेसू भीमसेन का बेटा है, पांडव भाइयों में सबसे अधिक शक्तिशाली हो गया है माना जाता है कि उन्होंने चंबल क्षेत्र पर शासन किया और महाभारत की लड़ाई का गवाह बनकर फैसला किया. वह कुरुक्षेत्र में हारने वाले की और से युद्ध करने आया जिसे श्रीकृष्ण न समझ लिए और गुरुदक्षिणा में उसका सिर माँगा टेसू ने - अपना सिर दे दिया ...लेकिन उसने कृष्ण से कहा कि में महाभारत युद्ध देखना चाहता हूँ ...कृष्ण ने उसकी इक्ष्छा पूरी करने के लिए तीन खंभे पर उसका सिर स्थापित किया है जहां से वह कुरुक्षेत्र की लड़ाई देख सके ...और बाद में उसकी इक्छा अनुसार झैंझी से शादी कर सके
आज देश के विभिन्न भागों में टेसू की प्रतिमा प्रतीकात्मक रूप से झैन्जी से शादी की जाने की परम्परा को निभाया जाता है. शरद पूर्णिमा की रात को सबसे सुंदर माना है . मानो कोई आकाश को धोकर साफ सुथरा करता हो . सितारों सर्दियों की ठंड , मुश्किल ताक अधिग्रहण , और चंद्रमा उज्जवल और मजबूत लगता है. तब टेसू की झैन्जी से शादी की जाती है . जिस घर में टेसू झैन्जी का विवाह किया जाता है उस घर में उत्सव होता है ...बच्चे घर घर भीख मांगकर शादी का समारोह मानते है .लड़के घरों रोचक ढंग से टेसू को सजाते है जैसे दूल्हा सजाया जाता है . तीन लड़कियों का जोड़ बनाकर टेसू तैयार होता है एक हाथ में एक लाल तोता और अन्य में एक हुक्का , घोषणा हँस आँखें , एक लाल पैन से सना हुआ मुंह , उसकी मूंछें के साथ एक खिलौना के रूप में दर्शाया जाता है ...जबकि लडकिया झैंझी तैयार करती है ...एक छोटी से कई छेद बाली मटकी में एक " दिया " जलाकर रखा जाता है जिसकी रौशनी फिल्टर होकर बाहर दिखती है . उस मटकी रूपी झैन्जी को भी खूब सजाया जाता है जैसे दुल्हन सजी हो. शरद पूर्णिमा को सभी लोग चाँद की रौशनी में टेसू और झैन्जी के गीत गाते है ...महिलाये मधुर आवाज में गाती है और टेसू के आने पर गाली गीत भी होते है .
शादी के बाद सभी बराती और घराती लोग एक लाइन से बैठकर भोजन करते है ...फिर टेसू और झैंझी को एक और लेजाकर नष्ट कर दिया जाता है और माना जाता है की उनका प्रेम अमर है और वे दो जिस्म और एक आत्मा हो गए है!!

बच्चों की पढ़ाई से पहले एक मूलभूत प्रश्न कि विवाह और बच्चे आपको क्यों चाहिए?

 बच्चों की पढ़ाई से पहले एक मूलभूत प्रश्न कि विवाह और बच्चे आपको क्यों चाहिए? क्योंकि पढ़ाई और स्कूल का सार इसी प्रश्न में छिपा हुआ है. सबसे मूल प्रश्न यही है कि विवाह क्यों करना है और बच्चे क्यों चाहिए? जब यह दो प्रश्न और उसके उत्तर स्पष्ट होते हैं, तो आने वाले जीवन में भ्रम नहीं रहता है. समस्या यही है कि हमें यही नहीं पता होता कि आखिर हमें बच्चे क्यों चाहिए?

केवल शादी करनी है, या केवल उन इच्छाओं की पूर्ति करनी है, जो आप बिना विवाह के नहीं कर सकते हैं, तो फिर शादी क्यों कर रहे हैं, उस इच्छा के लिए अनुबंध कर लीजिये! विवाह किसलिए? आर्थिक सुरक्षा के लिए, तो उसके लिए निवेश का विकल्प है! और सौभाग्य से आज के समय में यह दोनों ही कानूनी है, आप दैहिक इच्छाओं की पूर्ति करते हुए, बिना विवाह के, और अच्छे आर्थिक निवेश के साथ जीवन बिता सकते हैं. फिर विवाह क्यों? बच्चे क्यों?
हमारे यहाँ शास्त्रों में विवाह की महत्ता, इसलिए है क्योंकि विवाह के उपरांत ही व्यक्ति अर्द्धनारीश्वर के उस रूप को प्राप्त कर लेता है, जो स्वयं भगवान का रूप है! विवाह इसलिए क्योंकि आपके अस्तित्व को पूर्ण होना है. जिस क्षण यह भाव हृदय में उत्पन्न होता है, उस क्षण से आपको कभी भी अपने जीवन से कोई शिकायत रह ही नहीं जाती है. और जब विवाह अस्तित्व को पूर्ण करने के लिए होता है, तो हर प्रकार से संतुष्ट भाव ही एक संतुष्ट एवं मानसिक स्वस्थ सन्तान को उत्पन्न कर सकते हैं.
और वह आपके अस्तित्व का विस्तार है. इस सृष्टि में आपकी सन्तान आपके अस्तित्व का विस्तार है, जिसके बिना आपका जीवन निस्सार है! जिस क्षण आपने “हर प्रकार से संतुष्ट” संबंधों में रहते हुए गर्भ धारण किया, उसी क्षण आपके अस्तित्व को विराटता मिलनी आरम्भ हो जाती है. मातृत्व जीवन का अंत नहीं है, जैसा विकृत फेमिनिज्म बताता है, बल्कि यह जीवन का विस्तार है! अस्तित्व, व्यक्तित्व का विस्तार है!
परन्तु आज न ही संतुष्टि है, संतुष्टि में हर प्रकार की संतुष्टि की बात मैं कर रही हूँ. तो उस असंतुष्टि के भाव लेकर बच्चा जब आता है, तो उसका स्वागत तमाम तरह की चिंताओं के साथ होता है. अस्पताल का लाखों का बिल, हेल्थ बीमा, उसकी पढ़ाई का खर्च, आदि आदि! बच्चा एक लायबिलिटी बनकर आने लगा है, अस्तित्व तो कहीं है ही नहीं!
और इसी कारण बच्चों का स्वागत नहीं होता, क्योंकि वह टूटे सम्बन्धों में लाइबिलिटी बनकर आ रहा है!
और चूंकि जब वह लाइबिलिटी बनकर आता है, तो फिर हम उसमें निवेश करते हैं, जिससे कि वह समय पर हमें लाभ दे, लाभांश हमें मिलते रहें! न ही निस्वार्थ पालनपोषण है, न ही अस्तित्व का भाव! बच्चों को हमने एक ऐसे इन्वेस्टमेंट के रूप में ले लिया हैं जो इन मशीनी दैत्यों से हमें बचाएगा! और मशीनी दैत्यों से वह हमें बचाए, इसलिए हम उसे उस पढ़ाई में झोंक देते हैं, जो उसे उन्हीं मशीनी दैत्यों का मुकाबला करने में सक्षम बनाती है. इन सबमें मातृत्व कहाँ है?
सोचिये, आप बच्चे क्यों पैदा कर रहे हैं? सोचिये? पढ़ाई पर कल बात करेंगे! आज मात्र यही प्रश्न बार बार पूछिए और फिर जीवन में संतुष्टि की परिभाषा पर दृष्टि डालिए! चर्चा है, चलती रहनी चाहिए
ॐ नम: परमशिवाय!

मै अगर बौद्ध धर्म को अपनाना चांहू तो आप मुझे किस जाति का बौद्ध बनाओगे ॽ

 मै अगर बौद्ध धर्म को अपनाना चांहू तो आप मुझे किस जाति का बौद्ध बनाओगे ॽॽॽ

● ऊँची जाति वाले सवर्ण बौद्ध ॽॽॽ
● सामान्य जाति के बौद्ध ॽॽॽ
या
● फिर नीच कुजात अछूत जाति के बौद्ध ॽॽॽ
क्या कहा !!
बौद्ध में जाति-भेद नहीं होता ?
तो फिर ये
▪हीनयान
▪महायान
▪वज्रयान
▪भीमयान
▪थेरवाड
▪त्रिलोक
▪गरा
▪दरा
▪बेता
▪बेदा
▪फल्पा
▪थल्पा
▪दोम्बा
▪जोम्बा
▪बोडो
▪नोनो
क्या होते हैं ???
या फिर आप मुझे नीच, कुजात, अछूत, जाती का बौद्ध बनाओगे
--जैसे कि
▪बुराकुमिन
▪पयाक्युन
▪यांग्बान
▪बीकजोंग
▪जिआंमिन
▪रोधियास
▪राग्यब्पा
▪वज्रधरा
▪मोन
▪गराबा
यह तो बौद्ध धर्म की ऐसी अछूत जातियाँ हैं जिनका किसी भी बौद्ध मंदिर में प्रवेश तक वर्जित है तो बौद्ध भिक्षु बनना तो बहुत दूर की बात है। ? भगवान बुद्ध के जन्मदिन को
हम सब बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जानते हैं
भगवान बुद्ध को मानने वाले लोग बुद्ध धर्म का प्रचार और प्रसार प्रारंभ करते ही हिन्दू धर्म के विरोध स्वरूप बौद्ध धर्म को खड़ा करने लगे
भगवान बुद्ध ने अपनी किसी भी उपदेशना में हिंदू धर्म के विरुद्ध ना तो कोई बात कही है और न ही उन्होंने हिंदू धर्म की किसी रीति या संस्कार की कोई बुराई की है
भगवान् बुद्ध ने तो सिर्फ यह कहा की दुनिया
में क़स्ट है और कष्टों का निराकरण होना है
उन्होंने कष्टों के निराकरण के लिए 4 आर्यसत्य बताए
पहला दुख---उनका कहना था संसार में दुख है दूसरा समुदय-- उनका कहना था की दुख का कारण है
तीसरा निरोध-- उनका कहना था की दुख के निवारण है
चौथा है मार्ग-- जो दुखों के निवारण के लिए अव्यंगिक मार्ग है
भगवान बुद्ध ने आर्य सत्य के निराकरण
के लिए अष्टांग मार्ग की बात की और उन्होंने
कहा कि
सम्यक दृष्टि
सम्यक संकल्प
सम्यक वाक
सम्यक कर्म
सम्यक जीविका
सम्यक प्रयास
सम्यक स्मृति
सम्यक समाधि
जिनके माध्यम से इन दुखों का निराकरण कर सकते हैं
भगवान बुद्ध ने स्वयंमोक्ष प्राप्त करने के लिए साधना के मार्ग को अपनाया और साधना के मार्ग में उन्होंने सनातन धर्म की कुछ संकल्पनाओं का प्रचार किया
जिसमें अग्निहोत्र,गायत्री मंत्र,ध्यान,अंतर्दृष्टि
मध्य मार्ग का अनुसरण करना प्रमुख हैं
लेकिन दुर्भाग्य रहा कि भगवान बुद्ध के बताए
हुए मार्ग पर चलने का दावा करने वाले उनके अनुयायी ने भगवान बुद्ध के मार्ग को हिन्दुओं के विरोध के स्वरूप समाज में स्थापित करने का प्रयास किया और जो लंबे समय तक चला तथा भगवा के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया गया जबकि स्वान बौद्धभिक्षु भगवा से मिलता जुलता ही वस्त्र पहनते हैं और खुद दलाईलामा जी जो बौद्ध धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु हैं और वह भगवान शिव की पूजा करते हुए दिखाई देते हैं लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले बौद्ध धर्म के राजाओं ने बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म के विरुद्ध स्थापित किए जाने के लगातार प्रयास किए और सनातन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया
आज़ादी के बाद जब बाबा साहेब अंबेडकर
ने बौद्ध धर्म को अपनाया तो उसके बाद एक नए प्रकार का बौद्ध धर्म को कुछ लोगों के द्वारा प्रचारित किया गया जिसमें जय भीम का नारा दिया गया जिसमें नीले वस्त्रों का और नीले झंडे का प्रयोग किया जाने लगा और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि वो सारे के सारे लोग समाज के निचले तबके को बाबा साहब के नाम पर हिंदू धर्म के विरुद्ध भड़काने का काम करते रहे
मैं बौद्ध धर्म
के अपनाने वालों से एक बात पूछना चाहता हूँ कि भगवान बुद्ध ने अपनी किसी भी उपदेशना में हिंदू धर्म के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई बात कही हो तो उसे लोगों के सामने लाना चाहिए और मैं विश्वास के साथ ही यह कहता हूँ भगवान बुद्ध ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही
इसीलिए भगवान बुद्ध का उल्लेख
8 पुराणों में वर्णित है जिसमें उन्हें भगवान
विष्णु का नौंवा अवतार माना गया
वो पुराण है
हरिवंश पर्व
विष्णु पुराण
भागवत पुराण
गरुड़ पुराण
अग्नि पुराण
नारदीय पुराण
लिंग पुराण और पद्मपुराण
भगवान बुद्ध
जो अग्निहोत्र को मानते है
जो गायत्री मंत्र को मानते है
जो साधना के मार्ग से मोक्ष प्राप्त करने की बात
करते है वह हमारे हैं

माइग्रेन व पथरी की समस्या और मैग्नीशियम

 माइग्रेन व पथरी की समस्या और मैग्नीशियम

मुझे 2006 से 2014 तक हर 10-15 दिन में कभी भी भयंकर माइग्रेन का दर्द हो जाता था. कभी किसी यात्रा के कारण सुबह बहुत जल्दी जागना, कभी किसी कारण नाश्ता न कर पाना और फिर लंच भी लेट हो जाना, कभी शाम को अंधेरा होने के बाद घंटे भर से अधिक ड्राइविंग करना -ऐसे किसी भी कारण से बहुत तेज सिरदर्द हो जाता था और फिर कोई पेनकिलर लेकर सोने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता था.
फिर विटामिनों की जानकारी लेने के शौक के कारण मेरी पत्नी ने इंटरनेट पर इस विषय में पढ़ा कि अधिकतर लोगों में ऐसा मैग्नीशियम की कमी से भी होता है. उन्होंने मुझे रोज सुबह उठते ही मैग्नीशियम देना शुरु किया. पहले तो माइग्रेन की frequency कम हुई. फिर धीरे धीरे ऐसा हो चुका है कि पिछले 4-5 वर्ष में शायद कुल 2-3 बार ही माइग्रेन का दर्द हुआ है. पर अब जब ये दर्द होता भी है तो पहले की तरह बहुत अधिक नहीं होता, इसलिये दर्द के समय भी आवश्यक होने पर कोई कार्य कर पाता हूँ, ड्राइविंग भी कर पाता हूँ. जबकि पहले दर्द के समय कुछ करना सम्भव ही नहीं हो पाता था.
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अगर आप भी माइग्रेन से अक्सर परेशान रहते हैं तो होम्योपैथी की मैग्नीशियम Magnesia Phosphorica 6x की 7-8 टैबलेट रोज सुबह खाली पेट लीजिये. इससे महीने भर में ही माइग्रेन में काफी आराम आ जायेगा और 2-3 महीने बाद माइग्रेन से मुक्ति ही मिल जायेगी.
इस होम्योपैथी की मैग्नीशियम के कोई साइड इफैक्ट नहीं होते हैं. हां, कुछ अन्य लाभ अवश्य हैं. यह पथरी (stones) को भी समाप्त करता है. दरअसल हमारे शरीर में पथरी तभी बनती है जब हमारे शरीर में किसी कारण से कैल्सियम का प्रयोग सही से नहीं हो पाता है और वो एकत्रित होकर पथरी में बदल देता है. मैग्नीशियम उसी पथरी को धीरे धीरे पावडर में बदलने पर और मूत्र के साथ में शरीर से बाहर निकलने पर मजबूर कर देता है.
माइग्रेन व पथरी के लिये प्रयोग करके देखिये.
और हां
जय हिंद

आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध..! ?

 आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध..!

हमारे अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की। कुछ वामपंथी लेखकों ने तो बुद्ध को मानो कार्ल मार्क्स का पूर्व-रूप जैसा दिखाने का यत्न किया है। मानो वर्ग-विहीन समाज बनाने का विचार बुद्ध से ही शुरू हुआ देखा जा सकता है, आदि।
क्या है यक्ष भैरवी (स्वर्ण कर्षण भैरवी) साधना ? पद्धति एवं प्रभाव । #god #shiv #kundali #tantra
लेकिन यदि गौतम बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा हो। उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।
कौन थी देवी निकुम्भला?? साक्ष्य ,तंत्र प्रयोग विधि एवं प्रभाव l #god #shiv #kundali #tantra #bhajan
एक बार जब गौतम बुद्ध के मित्र प्रसेनादी को पता चला कि उन की पत्नी पूरी शाक्य नहीं, बल्कि एक दासी से उत्पन्न शाक्य राजा की पुत्री है, तब उस ने उस का और उस से हुए अपने पुत्र का परित्याग कर दिया। किन्तु बुद्ध ने अपने मित्र को समझा कर उस का कदम वापस करवाया। तर्क यही दिया कि पंरपरा से संतान की जाति पिता से निर्धारित होती है, इसलिए शाक्य राजा की पुत्री शाक्य है। यदि बुद्ध को जाति-प्रथा से कोई विद्रोह करना होता, या नया मत चलाना होता, तो उपयुक्त होता कि वे सामाजिक, जातीय परंपराओं का तिरस्कार करने को कहते। बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं किया। कभी नहीं किया।
क्या है गोमती चक्र ?? पद्धति , प्रभाव एवं प्रयोग! #god #shiv #kundali #tantra #वीडियो #gomati chakra
बुद्ध का यह व्यवहार सुसंगत था। तुलनात्मक धर्म के प्रसिद्ध ज्ञाता डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने इस पर बड़ी मार्के की बात कही है कि जिसे संसार को आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो, वह सामाजिक मामलों में कम से कम दखल देगा। कोई क्रांति करना, नया राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाना तो बड़ी दूर की बात रही! एल्स्ट के अनुसार, ‘यदि किसी आदमी के लिए अपनी ही मामूली कामनाएं संतुष्ट करना एक विकट काम होता है, तब किसी कल्पित समानतावादी समाज की अंतहीन इच्छाएं पूरी करने की ठानना कितना अंतहीन भटकाव होगा!’
क्या होता हैं अज्ञात भूत प्रेत बाधा?? प्रभाव एवं निवारण #god #shiv #kundali #tantra #bhajan #वीडियो
अतः यदि बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था, तो यह तर्कपूर्ण था कि वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में कम-से-कम हस्तक्षेप करते। उन की चिन्ता कोई ‘ब्राह्मण-वाद के विरुद्ध विद्रोह’, राजनीतिक कार्यक्रम, आदि की थी ही नहीं, जो आज के मार्क्सवादी, नेहरूवादी या कुछ अंबेदकरवादी उन में देखते या भरते रहते हैं। इसीलिए स्वभावतः बुद्ध के चुने हुए शिष्यों में लगभग आधे लोग ब्राह्मण थे। उन्हीं के बीच से वे अधिकांश प्रखर दार्शनिक उभरे, जिन्होंने समय के साथ बौद्ध-दर्शन और ग्रंथों को महान-चिंतन और गहन तर्क-प्रणाली का पर्याय बना दिया।
धनतेरस और आवश्यक कृत्य:- क्या मंत्र पाठ और विग्रह पूजन ही आवश्यक है?
यह भी एक तथ्य है कि भारत के महान विश्वविद्यालय बुद्ध से पहले की चीज हैं। तक्षशिला का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गौतम बुद्ध के पहले से था, जिस में बुद्ध के मित्र बंधुला और प्रसेनादी पढ़े थे। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ पढ़े थे। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि बौद्धों ने उन्हीं संस्थाओं को और मजबूत किया जो उन्हें हिन्दू समाज द्वारा पहले से मिली थी। बाद में, बौद्ध विश्वविद्यालयों ने भी आर्यभट्ट जैसे अनेक गैर-बौद्ध वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया। इसलिए, वस्तुतः चिंतन, शिक्षा और लोकाचार किसी में बुद्ध ने कोई ऐसी नई शुरुआत नहीं की थी जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान, परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जा सकता हो।
धनतेरस विशेष:- लक्ष्मी- कुबेर के अर्द्ध विग्रह की पूजा और त्वरित लाभ
ध्यान दें, बुद्ध ने भविष्य में अपने जैसे किसी और ज्ञानी (‘मैत्रेय’, मित्रता-भाईचारा का पालक) के आगमन की भी भविष्यवाणी की थी, और यह भी कहा कि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा। यदि बुद्ध के लिए कुल, जाति और वंश महत्वहीन होते, तो वे ऐसा नहीं कह सकते थे। उन्होंने अपने मित्र प्रसेनादी को वही समझाया, जो सब से प्राचीन उपनिषद में सत्यकाम जाबालि के संबंध में तय किया गया था। कि यदि उस की माता दासी भी थी, तब भी परिस्थिति उस के पिता को ब्राह्मण कुल का ही कोई व्यक्ति दिखाती थी, अतः वह ब्राह्मण बालक था और इस प्रकार अपने गुरू द्वारा स्वीकार्य शिष्य हुआ। उसी पारंपरिक रीति का पालन करने की सलाह बुद्ध ने अपने मित्र को दी थी।
क्या है यक्ष भैरवी (स्वर्ण कर्षण भैरवी) साधना ? पद्धति एवं प्रभाव । #god #shiv #kundali #tantra
इसीलिए वास्तविक इतिहास यह है कि पूर्वी भारत में गंगा के मैदानों वाले बड़े शासकों, क्षत्रपों ने गौतम बुद्ध का सत्कार अपने बीच के विशिष्ट व्यक्ति के रूप में किया था। क्योंकि बुद्ध वही थे भी। उन्हीं शासकों ने बुद्ध के अनुयायियों, भिक्षुओं के लिए बड़े-बड़े मठ, विहार बनवाए।
शनि यदि पाप फल देता है तो गुरु भी उससे ज्यादा अशुभ है.
जब बुद्ध का देहावसान हुआ, तब आठ नगरों के शासकों और बड़े लोगों ने उन की अस्थि-भस्मी पर सफल दावा किया थाः ‘हम क्षत्रिय हैं, बुद्ध क्षत्रिय थे, इसलिए उन के भस्म पर हमारा अधिकार है।’ बुद्ध के देहांत के लगभग आधी शती बाद तक बुद्ध के शिष्य सार्वजनिक रूप से अपने जातीय नियमों का पालन निस्संकोच करते मिलते हैं। यह सहज था, क्योंकि बुद्ध ने उन से अपने जातीय संबंध तोड़ने की बात कभी नहीं कही। जैसे, अपनी बेटियों को विवाह में किसी और जाति के व्यक्ति को देना, आदि।
दीपावली के इस विचित्र पर्व पर महाश्रीयंत्र की साधना और स्थापना
अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।
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पुराने बौद्ध विहारों, मठों, मंदिरों को भी देखें तो उन में वैदिक प्रतीकों और वास्तु-शास्त्र की बहुतायत मिलेगी। वे पुराने हिन्दू नमूनों का ही अनुकरण करते रहे हैं। बौद्ध मंत्रों में, भारत से बाहर भी, वैदिक मंत्रों की अनुकृति मिलती है। जब बुद्ध धर्म भारत से बाहर फैला, जैसे चीन, जापान, स्याम, आदि देशों में, तो यहाँ से वैदिक देवता भी बाहर गए। उदाहरण के लिए, जापान के हरेक नगर में देवी सरस्वती का मंदिर है। सरस्वती को वहाँ ले जाने वाले ‘धूर्त ब्राह्मण’ नहीं, बल्कि बौद्ध लोग थे!
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अपने जीवन के अंत में बुद्ध ने जीवन के सात सिद्धांतों का उल्लेख किया था, जिन का पालन करने पर कोई समाज नष्ट नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने सुंदर उपन्यास ‘सप्त-शील’ (1960) में उसी को वैशाली गणतंत्र की पृष्ठभूमि में अपना कथ्य बनाया है। इन सात सदगुणों में यह भी हैं – अपने पर्व-त्योहार का आदर करना एवं मनाना, तीर्थ व अनुष्ठान्न करना, साधु-संतों का सत्कार करना। हमारे अनेक त्योहार वैदिक मूल के हैं। बुद्ध से समय भी पर्व-त्योहार अपने से पहले के ही थे। महाभारत में भी नदी किनारे तीर्थ करने के विवरण मिलते हैं। सरस्वती और गंगा के तटों पर बलराम और पांडव तीर्थ करने गए थे। अतः जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों की बात है, बुद्ध ने कभी पुराने व्यवहारों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। यदि कुछ कहा, तो उन का आदर और पालन करने के लिए ही। इस प्रकार, कोई विद्रोही या क्रांतिकारी होने से ठीक उलट, गौतम बुद्ध पूरी तरह परंपरावादी थे। उन्होंने चालू राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सलाह दी थी। वे आजीवन एक हिन्दू दार्शनिक रहे। डॉ. एल्स्ट के शब्दों में, ‘बुद्ध अपने पोर-पोर में हिन्दू थे।’ लेकिन ठीक इसी बात को नकारने के लिए बुद्ध धर्म की भ्रांत व्याख्या की जाती रही है। इसे परखना चाहिए।
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